अन्वयः
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मत्-परं (पयः) दुर्लभं मत्वा मया आवर्जितं पयः पूर्वैः नूनं स्व-निःश्वासैः कवोष्णम् उपभुज्यते।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
मत्परमिति॥ मत्परं मदनन्तरम्।
अन्यारात्- (अष्टाध्यायी २.३.२९ ) इत्यादिना पञ्चमी। दुर्लभं दुर्लभ्यं मत्वा मयावर्जितं दत्तं पयः पूर्वैः पितृभिः स्वनिःश्वासैर्दुःखजैः कवोष्णमीषदुष्णं यथा तथोपभुज्यते। नूनमिति वितर्के। कवेष्णमिति कुशब्दस्य कवादेशः, कोष्णं कवोष्णं मन्दोष्णं कदुष्णं त्रिषु तद्वति इत्यमरः (अमरकोशः १.३.३९ ) ॥
Summary
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Thinking that water offerings will be rare after me, my ancestors surely drink the water offered by me made lukewarm by their own sighs of grief.
सारांश
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मेरे बाद तर्पण देने वाला कोई नहीं बचेगा, यह सोचकर पूर्वज मेरे द्वारा अर्पित किए गए जल को अपनी गरम लंबी सांसों से गुनगुना करके पी रहे हैं।
पदच्छेदः
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| मत्परम् | अस्मद्–परम् (२.१) | after me |
| दुर्लभम् | दुर्–लभ् (+खल्, २.१) | difficult to obtain |
| मत्वा | मत्वा (√मन्+क्त्वा) | thinking |
| नूनम् | नूनम् | surely |
| आवर्जितम् | आवर्जित (आ√वृज्+णिच्+क्त, १.१) | poured |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| पयः | पयस् (१.१) | water |
| पूर्वैः | पूर्व (३.३) | by the ancestors |
| स्वनिःश्वासैः | स्व–निःश्वास (निर्√श्वस्+घञ्, ३.३) | by their own sighs |
| कवोष्णम् | क–उष्ण (१.१) | lukewarm |
| उपभुज्यते | उपभुज्यते (उप√भुज् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is consumed |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | त्प | रं | दु | र्ल | भं | म | त्वा |
| नू | न | मा | व | र्जि | तं | म | या |
| प | यः | पू | र्वैः | स्व | निः | श्वा | सैः |
| क | वो | ष्ण | मु | प | भु | ज्य | ते |
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