इति विज्ञापितो राज्ञा ध्यानस्तिमितलोचनः ।
क्षणमात्रमृषिस्तस्थौ सुप्तमीन इव ह्रदः ॥

अन्वयः AI इति राज्ञा विज्ञापितः ऋषिः ध्यान-स्तिमित-लोचनः (सन्) सुप्त-मीनः ह्रदः इव क्षण-मात्रम् तस्थौ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) इतीति॥ इति राज्ञा विज्ञापित ऋषिर्ध्यानेन स्तिमिते लोचने यस्य ध्यानस्तिमितलोचनो निश्चलाक्षः सन् क्षणमात्रम्। सुप्तमीनो ह्रद इव। तस्थौ॥
Summary AI Thus requested by the King, the sage remained with eyes closed in meditation for a moment, like a lake in which the fish are asleep.
सारांश AI राजा की प्रार्थना सुनकर महर्षि वशिष्ठ ध्यानमग्न हो गए और क्षण भर के लिए वैसे ही स्थिर रहे जैसे शांत जल वाला कोई सरोवर, जिसमें मछलियाँ सो रही हों।
पदच्छेदः AI
इतिइति thus
विज्ञापितःविज्ञापित (वि√ज्ञा+णिच्+क्त, १.१) having been requested
राज्ञाराजन् (३.१) by the king
ध्यानस्तिमितलोचनःध्यानस्तिमितलोचन (१.१) whose eyes were steady in meditation
क्षणमात्रम्क्षणमात्र (२.१) for a mere moment
ऋषिःऋषि (१.१) the sage
तस्थौतस्थौ (√स्था कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) stood/remained
सुप्तमीनःसुप्तमीन (१.१) where the fish are asleep
इवइव like
ह्रदःह्रद (१.१) a lake
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
ति वि ज्ञा पि तो रा ज्ञा
ध्या स्ति मि लो नः
क्ष मा त्र मृ षि स्त स्थौ
सु प्त मी ह्र दः
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