अन्वयः
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कुण्ड-ऊध्नी वत्सा-आलोक-प्रवर्तिना अवभृथात् अपि मेध्येन कोष्णेन प्रस्रवेण भुवं अभिवर्षन्ती (सा आगता) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
भुवमिति॥ कोष्णेन किंचिदुष्णेन।
कवं चोष्णे (अष्टाध्यायी ६.३.१०७ ) इति चकारात्कादेशः। अवभृथादप्यवभृथस्नानादपि मेध्येन पवित्रेण पूतं पवित्रं मेध्यं च इत्यमरः (अमरकोशः ३.१.५५ ) । वत्सस्यालोकेन प्रदर्शनेन प्रवर्तिना प्रवहता प्रस्रवेन क्षीराभिस्यन्दनेन भुवमभिवर्षन्ती सिञ्चन्ती। कुण्डमिवोध आपीनं यस्याः सा कुण्डोध्नी। बहुर्वीहेरूधसो ङीष् (अष्टाध्यायी २.३.३५ ) इति ङीष्॥
Summary
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With an udder as large as a pot, she showered the earth with lukewarm milk—more purifying than even the ritual bath (avabhṛtha)—flowing at the sight of her calf.
सारांश
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अपने बछड़े को देख स्तनों से बहते हुए गुनगुने और पवित्र दूध से वह पृथ्वी को सींच रही थी, जो यज्ञ के बाद किए जाने वाले स्नान के जल से भी अधिक पावन था।
पदच्छेदः
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| कुण्डोध्नी | कुण्ड–ऊधन् (+ङीष्, १.१) | having an udder like a jar |
| वत्सालोकप्रवर्तिना | वत्स–आलोक–प्रवर्तिन् (प्र√वृत्+णिन्, ३.१) | flowing at the sight of the calf |
| मेध्येन | मेध्य (३.१) | pure |
| अवभृथात् | अवभृथ (५.१) | than the ritual bath |
| अपि | अपि | even |
| कोष्णेन | कोष्ण (३.१) | warm |
| प्रस्रवेण | प्रस्रव (३.१) | with the flow of milk |
| भुवम् | भू (२.१) | the earth |
| अभिवर्षन्ती | अभिवर्षन्ती (अभि√वृष्+शतृ+ङीप्, १.१) | showering |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भु | वं | को | ष्णे | न | कु | ण्डो | ध्नी |
| मे | ध्ये | ना | व | भृ | था | द | पि |
| प्र | स्र | वे | णा | भि | व | र्ष | न्ती |
| व | त्सा | लो | क | प्र | व | र्ति | ना |
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