अन्वयः
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खुर-उद्धूतैः अन्तिकात् गात्रं स्पृशद्भिः रजः-कणैः महीक्षितः तीर्थ-अभिषेक-जाम् शुद्धिम् आदधाना (सा आगता) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
रज इति॥ खुरोद्धूतैरन्तिकात्समीपे गात्रं स्पृशद्भिः।
दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया च (अष्टाध्यायी २.३.३५ ) इति चकारात्पञ्चमी। रजसां कणैः। महीं क्षियत ईष्ट इति महीक्षित्। तस्य। तीर्थाभिषेकेण जातां तीर्थाभिषेकजाम्। शुद्धिमादधाना कुर्वाणा। एतेन वायव्यं स्नानमुक्तम्। उक्तं च मनुनाआग्रेयं भस्मना स्नानमवगाह्यं तु वारुणम्। आपोहिष्ठेति च ब्राह्मं वायव्यं गोरजः स्मृतम्॥ इति॥
Summary
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By the dust particles raised by her hooves touching his body nearby, she conferred upon the king a purity equal to that attained by bathing in sacred waters (tīrtha).
सारांश
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गाय के खुरों से उड़ी हुई धूलि राजा दिलीप के शरीर को स्पर्श कर उन्हें वैसी ही पवित्रता प्रदान कर रही थी जैसी किसी तीर्थ में स्नान करने से प्राप्त होती है।
पदच्छेदः
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| अन्तिकात् | अन्तिक (५.१) | from nearby |
| गात्रम् | गात्र (२.१) | body |
| स्पृशद्भिः | स्पृशत् (√स्पृश्+शतृ, ३.३) | touching |
| खुरोद्धूतैः | खुर–उद्धूत (उत्√धू+क्त, ३.३) | raised by hooves |
| रजःकणैः | रजस्–कण (३.३) | with particles of dust |
| महीक्षितः | मही–क्षि (६.१) | of the King |
| तीर्थाभिषेकजाम् | तीर्थ–अभिषेक–जन् (+ड+टाप्, २.१) | born of a holy bath |
| शुद्धिम् | शुद्धि (२.१) | purity |
| आदधाना | आदधाना (आ√धा+शानच्, १.१) | bestowing |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | जः | क | णैः | खु | रो | द्धू | तैः |
| स्पृ | श | द्भि | र्गा | त्र | म | न्ति | कात् |
| ती | र्था | भि | षे | क | जां | शु | द्धि |
| मा | द | धा | ना | म | ही | क्षि | तः |
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