अन्वयः
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इति अस्याः प्रसादात् आ त्वम् परिचर्या-परः भव ते अ-विघ्नम् अस्तु पुत्रिणाम् धुरि पिता इव स्थेयाः ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
इतीति॥ इत्यनेन प्रकारेण त्वमा प्रसादात् प्रसादपर्यन्तम्।
आङ् मर्यादाभिविध्योः (अष्टाध्यायी २.१.१३ ) इत्यस्य वैभाषिकत्वादसमासत्वम्। अस्या धेनोः परिचर्यापरः शुश्रूषापरो भवः; ते तवाविघ्नं विघ्नस्याभावोऽस्तु। अव्ययं विभक्ति- (अष्टाध्यायी २.१.६ ) इत्यादिनार्थाभावेऽव्ययीभावः। पितेव पुत्रीणां सत्पुत्रवताम्। प्रशंसायामिनिप्रत्ययः। धुर्यग्रे स्थेयास्तिष्ठेः। आशीरर्थे लिङ्। एर्लिङि (अष्टाध्यायी ६.४.६७ ) इत्याकारस्यैकारादेशः। त्वत्सदृशो भवत्पुत्रोऽस्त्विति भावः॥
Summary
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Be devoted to her service until she is pleased. May there be no obstacles; may you stand at the head of those with sons, just like your father.
सारांश
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जब तक यह प्रसन्न न हो जाए, तब तक इसकी सेवा में तत्पर रहें। आपकी राह बाधा रहित हो और आप अपने पिता के समान ही श्रेष्ठ पुत्र वाले बनें।
पदच्छेदः
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| इति | इति | thus |
| अस्याः | इदम् (६.१) | of her (the cow) |
| प्रसादात् | सद् (प्र√सद्, +घञ्, ५.१) | until the favor |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| परिचर्यापरः | चर्या (परि√चर्+यत्)–पर (१.१) | devoted to service |
| भव | भव (√भू कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | be |
| अविघ्नम् | विघ्न (१.१) | freedom from obstacles |
| अस्तु | अस्तु (√अस् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let there be |
| ते | युष्मद् (६.१) | for you |
| स्थेयाः | स्थेयाः (√स्था कर्तरि आशीर्लिङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | may you stand |
| पिता | पितृ (१.१) | a father |
| इव | इव | like |
| धुरि | धुर् (७.१) | at the head |
| पुत्रिणाम् | पुत्रिन् (६.३) | of those who have sons |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्या | प्र | सा | दा | द | स्या | स्त्वं |
| प | रि | च | र्या | प | रो | भ | व |
| अ | वि | घ्न | म | स्तु | ते | स्थे | याः |
| पि | ते | व | धु | रि | पु | त्रि | णाम् |
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