अन्वयः
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अथ प्रदोषे दोष-ज्ञः सूनृत-वाक् स्रष्टुः सूनुः उदित-श्रियम् विशाम्-पतिम् संवेशाय विससर्ज ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अथेति॥ अथ प्रदोषे रात्रौ दोषज्ञो विद्वान्।
विद्वान्विपश्चिपश्चिद्दोषज्ञः इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२२५ ) । सूनृतवाक् सत्यप्रियवाक्। प्रियं सत्यं च सूनृतम् इति हलायुधः। स्रष्टुः सूनुर्ब्रह्मपुत्रो मुनिः। अनेन प्रकृतकार्यनिर्वाहकत्वं सूचयति। उदितश्रियं विशांपतिं मनुजेश्वरम्। द्वौ विशौ वैश्यमनुजौ इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२२५ ) । संवेशाय निद्रायै। स्यान्निद्रा शयनं स्वापः स्वप्नः संवेश इत्यपि इत्यमरः (अमरकोशः १.७.३८ ) । विससर्जाज्ञापयामास ॥
Summary
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Then at twilight, the son of the Creator (Vasiṣṭha), who knew all faults and spoke pleasantly, dismissed the glorious king to rest.
सारांश
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रात्रि होने पर, तत्वों के ज्ञाता महर्षि वशिष्ठ ने तेजस्वी राजा दिलीप को विश्राम करने के लिए जाने की आज्ञा दी।
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | then |
| प्रदोषे | प्रदोष (७.१) | at nightfall |
| दोषज्ञः | दोष–ज्ञा (+क, १.१) | knower of faults (wise) |
| संवेशाय | संवेश (सम्√विश्+घञ्, ४.१) | for sleep |
| विशांपतिम् | विश् (६.३)–पति (२.१) | the lord of the subjects (king) |
| सूनुः | सूनु (१.१) | the son |
| सूनृतवाक् | सूनृत–वाच् (+क्विप्, १.१) | speaking pleasant truths |
| स्रष्टुः | स्रष्टृ (६.१) | of the Creator (Brahmā) |
| विससर्ज | विससर्ज (वि√सृज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | dismissed |
| उदितश्रियम् | उदित (उद्√इ+क्त)–श्री (२.१) | whose glory was rising |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | प्र | दो | षे | दो | ष | ज्ञः |
| सं | वे | शा | य | वि | शां | प | तिम् |
| सू | नुः | सू | नृ | त | वा | क्स्र | ष्टु |
| र्वि | स | स | र्जो | दि | त | श्रि | यम् |
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