अन्वयः
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बृहता उरसा प्रभा-अनुलिप्त-श्रीवत्सम्, लक्ष्मी-विभ्रम-दर्पणम्, कौस्तुभ-आख्यम् अपाम् सारम् बिभ्राणम् (तम् ददृशुः) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
प्रभेति॥ पुनः किंविधम्? प्रभयाऽनुलिप्तमनुरञ्जितं श्रीवत्सं नाम लाञ्छनं येन तम्। लक्ष्म्या विभ्रमदर्पणं कौस्तुभ इत्याख्या यस्य तम्। अपां समुद्राणां सारं स्थिरांशम्। अम्मयमणिमित्यर्थः। बृहतोरसा बिभ्राणम् ॥
Summary
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They saw him, bearing on his broad chest the Kaustubha gem—the essence of the waters—which served as a mirror for Lakshmi's charms and whose lustre anointed the Srivatsa mark.
सारांश
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अपने विशाल वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि धारण किए हुए भगवान ऐसे सुशोभित थे, मानो वह मणि लक्ष्मी जी के विलास को देखने का दर्पण हो।
पदच्छेदः
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| प्रभानुलिप्तश्रीवत्सं | प्रभा–अनुलिप्त–श्रीवत्स (२.१) | whose Srivatsa mark was anointed by lustre |
| लक्ष्मीविभ्रमदर्पणम् | लक्ष्मी–विभ्रम–दर्पण (२.१) | a mirror for the charms of Lakshmi |
| कौस्तुभाख्यम् | कौस्तुभ–आख्या (२.१) | named Kaustubha |
| अपाम् | अप् (६.३) | of the waters |
| सारं | सार (२.१) | the essence |
| बिभ्राणं | बिभ्राण (√भृ+शानच्, २.१) | bearing |
| बृहता | बृहत् (३.१) | by his broad |
| उरसा | उरस् (३.१) | chest |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | भा | नु | लि | प्त | श्री | व | त्सं |
| ल | क्ष्मी | वि | भ्र | म | द | र्प | णम् |
| कौ | स्तु | भा | ख्य | म | पां | सा | रं |
| बि | भ्रा | णं | बृ | ह | तो | र | सा |
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