प्रबुद्धपुण्डरीकाक्षं बालातपनिभांशुकम् ।
दिवसं शारदमिव प्रारम्भसुखदर्शनम् ॥

अन्वयः AI प्रबुद्ध-पुण्डरीक-अक्षम्, बाल-आतप-निभ-अंशुकम्, प्रारम्भ-सुख-दर्शनम् (तम्) शारदम् दिवसम् इव (ददृशुः) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) प्रबुद्धेति॥ पुनः कीदृशम्? प्रबुद्धे विकसिते पुण्डरीके इवाक्षिणी यस्य त्तम्। दिवसे तु पुण्डरीकमेवाक्षि यस्येति विग्रहः। बालातपनिभमंशुकं यस्य तम्। पीताम्बरधरमित्यर्थः। अन्यत्र, -बालातपव्याजांशुकमित्यर्थः। निभो व्याजसदृक्षयोः इति विश्वः। प्रकृष्ट आरम्भो योगो येषां ते प्रारम्भा प्रकृष्टोद्योगा योगिनः। तेषां सुखदर्शनम्। अन्यत्र, -प्रारम्भ आदौ सुखदर्शनं शारदं शरत्संबन्धिनं दिवसमिव स्थितम्॥
Summary AI They saw him, whose eyes were like blooming white lotuses and whose garment resembled the morning sun, who was as pleasant to behold as an autumn day at its beginning.
सारांश AI खिले हुए कमलों के समान नेत्रों वाले और प्रभात की धूप जैसे पीतांबर धारी भगवान विष्णु शरद ऋतु के अत्यंत मनोहर दिन के समान प्रतीत हो रहे थे।
पदच्छेदः AI
प्रबुद्धपुण्डरीकाक्षंप्रबुद्धपुण्डरीकअक्षि (२.१) whose eyes were like blooming white lotuses
बालातपनिभांशुकम्बाल-आतपनिभअंशुक (२.१) whose garment resembled the morning sun
दिवसंदिवस (२.१) a day
शारदम्शारद (२.१) of autumn
इवइव like
प्रारम्भसुखदर्शनम्प्रारम्भसुखदर्शन (२.१) who was pleasant to behold at the beginning
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
प्र बु द्ध पु ण्ड री का क्षं
बा ला नि भां शु कम्
दि सं शा मि
प्रा म्भ सु र्श नम्
About

Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.