अन्वयः
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दैत्य-स्त्री-गण्ड-लेखानाम् मद-राग-विलोपिभिः, चेतनावद्भिः हेतिभिः च उदीरित-जय-स्वनम् (तम् ददृशुः) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
दैत्येति॥ दैत्यस्त्रीगण्डलेखानामसुराङ्गनागण्डस्थलीनां यो मदरागस्तं विलुम्पन्ति हरन्तीति मदरागविलोपिनः। तैश्चेतनावद्भिः सजीवैर्हेतिभिः सुदर्शनादिभिः शश्त्रैः।
रवेरर्चिश्च शश्त्रं च वह्निज्वाला च हेतयः। इत्यमरः। उदीरितजयस्वनम्। जयशब्दमुद्धोषयन्तीभिर्मूर्तिमतीभिरस्त्रदेवताभिरुपास्यमानमित्यर्थः ॥
Summary
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They saw him, whose victory was proclaimed by his sentient weapons, which had wiped away the blush of pride from the cheeks of the wives of the Daityas.
सारांश
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दैत्य स्त्रियों के विलास और वैभव को नष्ट करने वाले भगवान के चेतन आयुध (शस्त्र) साक्षात् उपस्थित होकर उनकी जय-जयकार कर रहे थे।
पदच्छेदः
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| दैत्यस्त्रीगण्डलेखानां | दैत्य–स्त्री–गण्ड–लेखा (६.३) | of the cheeks of the Daitya women |
| मदरागविलोपिभिः | मद–राग–विलोपिन् (३.३) | by those which wipe away the blush of pride |
| हेतिभिः | हेति (३.३) | by the weapons |
| च | च | and |
| चेतनावद्भिः | चेतनावत् (३.३) | sentient |
| उदीरितजयस्वनम् | उदीरित (उद्√ईर्+क्त)–जय–स्वन (२.१) | he whose victory-sound was proclaimed |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दै | त्य | स्त्री | ग | ण्ड | ले | खा | नां |
| म | द | रा | ग | वि | लो | पि | भिः |
| हे | ति | भि | श्चे | त | ना | व | द्भि |
| रु | दी | रि | त | ज | य | स्व | नम् |
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