अन्वयः
AI
अथ सुराः सुर-द्विषाम् शमयित्रे तस्मै प्रणिपत्य, अवाक्-मनस-गोचरम् स्तुत्यम् एनम् तुष्टुवुः ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
प्रणिपत्येति॥ अथ दर्शनानन्तरं सुराः सुरद्विषामसुराणां शमयित्रे विनाशकाय तस्मै विष्णवे प्रणिपत्य स्तुत्यं स्तोत्रार्हम्।
एतिस्तुशास्वृदृजुषः क्यप् (अष्टाध्यायी ३.१.१०९ ) इति क्यप्प्रत्ययः। वाक्च मनश्च वाङ्मनसे। अचतुर- (अष्टाध्यायी ५.४.७७ ) इत्यच्प्रत्ययान्तो निपातः। तयोर्गोचरो विषयो न भवतीत्यवाङ्मनसगोचरः। तमेनं विष्णुं तुष्टुवुरस्तुवन् ॥
Summary
AI
Then the gods, after bowing down to him, the subduer of the enemies of the gods, praised him who is worthy of praise yet beyond the reach of speech and mind.
सारांश
AI
देवताओं ने असुरों का दमन करने वाले, मन और वाणी की पहुँच से परे और स्तुति के योग्य भगवान विष्णु को प्रणाम कर उनकी स्तुति प्रारंभ की।
पदच्छेदः
AI
| प्रणिपत्य | प्रणिपत्य (प्र+नि√पत्+ल्यप्) | having bowed down |
| सुराः | सुर (१.३) | the gods |
| तस्मै | तद् (४.१) | to him |
| शमयित्रे | शमयितृ (√शम्+णिच्+तृच्, ४.१) | to the subduer |
| सुरद्विषाम् | सुर–द्विष् (६.३) | of the enemies of the gods |
| अथ | अथ | then |
| एनम् | एतद् (२.१) | him |
| तुष्टुवुः | तुष्टुवुः (√स्तु कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | praised |
| स्तुत्यम् | स्तुत्य (√स्तु+यत्, २.१) | who is worthy of praise |
| अवाङ्मनसगोचरम् | अवाच्–मनस्–गोचर (२.१) | who is beyond the reach of speech and mind |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | णि | प | त्य | सु | रा | स्त | स्मै |
| श | म | यि | त्रे | सु | र | द्वि | षाम् |
| अ | थै | नं | तु | ष्टु | वुः | स्तु | त्य |
| म | वा | ङ्म | न | स | गो | च | रम् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.