अमेयो मितलोकस्त्वमनर्थी प्रार्थनावहः ।
अजितो जिष्णुरत्यन्तमव्यक्तो व्यक्तकारणम् ॥

अन्वयः AI त्वम् अमेयः (अपि) मित-लोकः, अनर्थी (अपि) प्रार्थना-वहः, अजितः (अपि) जिष्णुः, अत्यन्तम् अव्यक्तः (अपि) व्यक्त-कारणम् (असि) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) अमेय इति॥ हे देव! त्वममेयो लोकैरियत्तया न परिच्छेद्यः। मितलोकः परिच्छिन्नलोकः। अनर्थी निःस्पृहः। आवहतीत्यावहः। पचाद्यच्। प्रार्थनानामावहः कामदः। अजितोऽन्यैर्न जितः। जिष्णुर्जयशीलः। अत्यन्तमव्यक्तोऽतिसूक्ष्मरूपः। व्यक्तस्य स्थूलरूपस्य कारणम् ॥
Summary AI You are immeasurable, yet you have measured the worlds. You have no desires, yet you fulfill prayers. You are unconquered, yet you are ever victorious. You are utterly unmanifest, yet you are the cause of the manifest world.
सारांश AI आप अपरिमेय होकर भी लोकों के मापक हैं, निष्काम होकर भी सबकी इच्छा पूर्ण करते हैं, अजेय होकर भी विजयी हैं और अव्यक्त होकर भी जगत के कारण हैं।
पदच्छेदः AI
अमेयःअमेय (अ√मा+यत्, १.१) immeasurable
मितलोकःमितलोक (१.१) one who has measured the worlds
त्वम्युष्मद् (१.१) you
अनर्थीअनर्थिन् (१.१) one without needs
प्रार्थनावहःप्रार्थनाआवह (१.१) one who fulfills prayers
अजितःअजित (अ√जि+क्त, १.१) unconquered
जिष्णुःजिष्णु (√जि+स्नु, १.१) victorious
अत्यन्तम्अत्यन्तम् utterly
अव्यक्तःअव्यक्त (१.१) unmanifest
व्यक्तकारणम्व्यक्तकारण (१.१) the cause of the manifest
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
मे यो मि लो स्त्व
र्थी प्रा र्थ ना हः
जि तो जि ष्णु त्य न्त
व्य क्तो व्य क्त का णम्
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