अन्वयः
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सः च पूर्वेषाम् ऋण-निर्मोक्ष-साधनं, सद्यः शोक-तमः-अपहं, सुत-अभिधानं तत् ज्योतिः न उपलेभे।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
न चेति॥ स दशरथथः पूर्वेषां पितॄणामृणनिर्मोक्षसाधनम्।
एष वा अनृणो यः पुत्री इति श्रुतेः। पितॄणामृणनिर्मुक्तिकारणम्। सद्यः शोक एव तमस्तदपहन्तीति शोकतमोपहम्। अत्रअभयंकर इतिवदुपपदेऽपि तदन्तविधिमाश्रित्य अपे क्लेशतमसोः (अष्टाध्यायी ३.२.५० ) इति डप्रत्ययः। सुताभिधानं सुताख्यं ज्योतिर्नोपलेमे न प्राप च ॥
Summary
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And he did not obtain that light named 'son'—the means of release from the debt to his ancestors and the immediate dispeller of the darkness of grief.
सारांश
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राजा दशरथ को अपने पूर्वजों के ऋण से मुक्ति दिलाने वाला और शोक के अंधकार को मिटाने वाला पुत्र रूपी दिव्य प्रकाश प्राप्त नहीं हुआ था।
पदच्छेदः
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| न | न | not |
| च | च | and |
| उपलेभे | उपलेभे (उप√लभ् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | he obtained |
| पूर्वेषाम् | पूर्व (६.३) | of his ancestors |
| ऋणनिर्मोक्षसाधनम् | ऋण–निर्मोक्ष–साधन (२.१) | the means of release from the debt |
| सुताभिधानम् | सुत–अभिधान (२.१) | named 'son' |
| सः | तत् (१.१) | he |
| ज्योतिः | ज्योतिस् (२.१) | the light |
| सद्यः | सद्यस् | immediately |
| शोकतमोपहम् | शोक–तमस्–अपह (२.१) | which destroys the darkness of grief |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | चो | प | ले | भे | पू | र्वे | षा |
| मृ | ण | नि | र्मो | क्ष | सा | ध | नम् |
| सु | ता | भि | धा | नं | स | ज्यो | तिः |
| स | द्यः | शो | क | त | मो | प | हम् |
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