अन्वयः
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(ऋषयः) त्वाम् सप्त-साम-उपगीतम्, सप्त-अर्णव-जल-ईशयम्, सप्त-अर्चिः-मुखम्, सप्त-लोक-एक-संश्रयम् आचख्युः ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
सप्तेति॥ हे देव! त्वां सप्तभिः सामभी रथंतरादिभिरुपगीतम्।
तद्धित्तार्थ- (अष्टाध्यायी २.१.५१ ) इत्युत्तरपदसमासः। सप्तानामर्णवानां जलं सप्तार्णवजलम्। पूर्ववत्समासः। तत्र शेते यः स सप्तार्णवजलेशयः। तम्। शयवासवासिष्वकालात् (अष्टाध्यायी ६.३.१८ ) इत्यलुक्। सप्तार्चिर्मुखं यस्य तम्। अग्निमुख! वै देवा इति श्रुतेः। सप्तानां लोकानां भूर्भुवःस्वरादीनामेकसंश्रयम्। एवंभूतमाचख्युः ॥
Summary
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They declared you as the one praised by the seven Samans, the one who reclines on the waters of the seven oceans, the one whose mouth is the seven-flamed fire (Agni), and the sole refuge of the seven worlds.
सारांश
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सात सामों द्वारा गाए जाने वाले, सातों समुद्रों के जल में शयन करने वाले, अग्निमुख तथा सातों लोकों के एकमात्र आश्रयदाता के रूप में मुनि आपको पुकारते हैं।
पदच्छेदः
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| सप्तसामोपगीतं | सप्त–सामन्–उपगीत (२.१) | praised by the seven Samans |
| त्वां | युष्मद् (२.१) | you |
| सप्तार्णवजलेशयम् | सप्त–अर्णव–जल–ईशय (२.१) | reclining on the waters of the seven oceans |
| सप्तार्चिर्मुखम् | सप्तार्चिस्–मुख (२.१) | whose mouth is the seven-flamed fire |
| आचख्युः | आचख्युः (आ√ख्या कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they declared |
| सप्तलोकैकसंश्रयम् | सप्त–लोक–एक–संश्रय (२.१) | the sole refuge of the seven worlds |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | प्त | सा | मो | प | गी | तं | त्वां |
| स | प्ता | र्ण | व | ज | ले | श | यम् |
| स | प्ता | र्चि | र्मु | ख | मा | च | ख्युः |
| स | प्त | लो | कै | क | सं | श्र | यम् |
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