अन्वयः
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यतः केवलम् स्मरणेन एव पुरुषम् पुनासि, अनेन (कारणेन) शेषाः वृत्तयः त्वयि निवेदितफलाः (भवन्ति)।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
केवलमिति॥ स्मरणेन केवलं कृत्स्नम्।
केवलः कृत्स्न एकश्च इति शाश्वतः। पुरुषं स्मर्तारं जनं पुनासि। यतः यदित्यर्थः। अनेन स्मृतिकार्येणैव त्वयि त्वद्विषये याः शेषा अवशिष्टा वृत्तयो दर्शनस्पर्शनादयो व्यापारास्ता निवेदितफला विज्ञापितकार्याः। तव स्मरणस्यैवैतत्फलं, दर्शनादीनां तु कियदिति नावधारयाम इति भावः ॥
Summary
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Since You purify a person merely by being remembered, all other religious duties and actions find their ultimate fruit and purpose in You.
सारांश
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चूंकि आप केवल स्मरण मात्र से ही मनुष्य को पवित्र कर देते हैं, इसलिए आपके दर्शन और स्तुति आदि अन्य क्रियाओं के महान फल के विषय में कुछ कहना शेष नहीं रह जाता।
पदच्छेदः
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| केवलम् | केवल | merely |
| स्मरणेन | स्मरण (३.१) | by remembrance |
| एव | एव | alone |
| पुनासि | पुनासि (√पू कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | You purify |
| पुरुषम् | पुरुष (२.१) | a person |
| यतः | यतः | since |
| अनेन | इदम् (३.१) | by this |
| वृत्तयः | वृत्ति (१.३) | actions/duties |
| शेषाः | शेष (१.३) | other |
| निवेदितफलाः | निवेदित–फल (१.३) | have their fruits offered |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | in You |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| के | व | लं | स्म | र | णे | नै | व |
| पु | ना | सि | पु | रु | षं | य | तः |
| अ | ने | न | वृ | त्त | यः | शे | षा |
| नि | वे | दि | त | फ | ला | स्त्व | यि |
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