Loading data... On slow networks this could take a few minutes.
100%

उदधेरिव रत्नानि तेजांसीव विवस्वतः ।
स्तुतिभ्यो व्यतिरिच्यन्ते दूराणि चरितानि ते ॥

अन्वयः AI ते दूराणि चरितानि उदधेः रत्नानि इव, विवस्वतः तेजांसि इव, स्तुतिभ्यः व्यतिरिच्यन्ते।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) उदधेरिति॥ उदधे रत्नानीव। विवस्वतस्तेजांसीव। दूराण्यवाङ्भनसगोचराणि ते चरितानि स्तुतिभ्यो व्यतिरिच्यन्ते। निःशेषं स्तोतुं न शक्यन्त इत्यर्थः ॥
Summary AI Your profound deeds far surpass any praise, just as the gems of the ocean or the rays of the sun are beyond complete enumeration or grasp.
सारांश AI जैसे समुद्र के रत्नों और सूर्य के तेज का अंत नहीं है, वैसे ही आपके अलौकिक चरित्र भी समस्त स्तुतियों की सीमा से बहुत परे हैं।
पदच्छेदः AI
उदधेःउदधि (५.१) than the ocean's
इवइव like
रत्नानिरत्न (१.३) gems
तेजांसितेजस् (१.३) rays
इवइव like
विवस्वतःविवस्वत् (६.१) of the sun
स्तुतिभ्यःस्तुति (५.३) than praises
व्यतिरिच्यन्तेव्यतिरिच्यन्ते (वि+अति√रिच् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) are distinct/surpass
दूराणिदूर (१.३) far beyond
चरितानिचरित (१.३) deeds
तेयुष्मद् (६.१) Your
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
धे रि त्ना नि
ते जां सी वि स्व तः
स्तु ति भ्यो व्य ति रि च्य न्ते
दू रा णि रि ता नि ते
About

Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.