अन्वयः
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पुराणस्य कवेः तस्य वर्णस्थानसमीरिता कृतसंस्कारा भारती चरितार्था एव बभूव।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
पुराणस्येति॥ पुराणस्य चिरंतनस्य कवेस्तस्य भगवतो वर्णस्थानेषूरः-कण्ठादिषु समीरिता सम्यगुञ्चारिता। अत एव कृतः संपादितः संस्कारः साधुत्वस्पष्टतादिप्रयत्नो यस्याः सा भारती वाणी चरितार्था कृतार्था वभूवैव।
एव- कारस्त्वसंभावनाविपरीतभावनाव्युदासार्थः ॥
Summary
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The speech of that ancient poet (the Lord), perfectly articulated from the proper places of pronunciation and grammatically refined, became inherently meaningful and fulfilled its purpose.
सारांश
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उन पुरातन कवि (परमात्मा) की व्याकरण सम्मत और शुद्ध उच्चारण वाली वाणी अपने अर्थ को पूर्णतः स्पष्ट करने वाली और सार्थक सिद्ध हुई।
पदच्छेदः
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| पुराणस्य | पुराण (६.१) | of the ancient |
| कवेः | कवि (६.१) | of the poet |
| तस्य | तद् (६.१) | His |
| वर्णस्थानसमीरिता | वर्ण–स्थान–समीरिता | articulated from the proper places of pronunciation |
| बभूव | बभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| कृतसंस्कारा | कृत–संस्कार (१.१) | grammatically refined |
| चरितार्था | चरित–अर्थ (१.१) | fulfilled in its meaning |
| एव | एव | indeed |
| भारती | भारती (१.१) | speech |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | रा | ण | स्य | क | वे | स्त | स्य |
| व | र्ण | स्था | न | स | मी | रि | ता |
| ब | भू | व | कृ | त | सं | स्का | रा |
| च | रि | ता | र्थै | व | भा | र | ती |
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