बभौ सदशनज्योत्स्ना सा विभोर्वदनोद्गता ।
निर्यातशेषा चरणाद्गङ्गेवोर्ध्वप्रवर्तिनी ॥

अन्वयः AI विभोः वदनोद्गता सदशनज्योत्स्ना सा (भारती) चरणात् निर्यातशेषा ऊर्ध्वप्रवर्तिनी गङ्गा इव बभौ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) बभाविति॥ विभोर्विष्णोर्वदनादुद्गता निःसृता। सदशनज्योत्स्ना दन्तकान्तिसहिता। इदं च विशेषणं धावल्यातिशयार्थम्। अत एव सा भारती। चरणादङ्घ्रेर्निर्याता चासौ शेषा च निर्यातशेषा। निःसृतावशिष्टेत्यर्थः। स्रियाः पुंवत्- (अष्टाध्यायी ६.३.३४ ) इत्यनुवर्त्य पुंवत्कर्मधारय- (अष्टाध्यायी ६.३.४२ ) इति पुंवद्भावः। निर्यातशब्दस्य या निर्याता सावशेषा सा गङ्गेवेति सामानाधिकरण्यनिर्वाहः। निर्यातायाः शेषेति विग्रहे पुंवद्भावो दुर्घटा एव। ऊर्ध्वप्रवर्तिन्यूर्ध्ववाहिनी गङ्गेव। बभौ। इत्युत्प्रेक्षा ॥
Summary AI That speech, issuing from the Lord's mouth and illuminated by the moonlight of his teeth, shone like the river Ganga, which, after emerging from his foot, flows upwards towards heaven.
सारांश AI भगवान के मुख से निकलती हुई और दांतों की कांति से चमकती हुई वह वाणी ऐसी सुशोभित हुई मानो उनके चरणों से निकली गंगा का शेष भाग ऊपर की ओर बह रहा हो।
पदच्छेदः AI
बभौबभौ (√भा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) shone
सदशनज्योत्स्नासहदशनज्योत्स्ना (१.१) with the moonlight of its teeth
सातद् (१.१) that (speech)
विभोःविभु (६.१) of the Lord
वदनोद्गतावदनउद्गता issuing from the mouth
निर्यातशेषानिर्यातशेष (१.१) the remainder after issuing
चरणात्चरण (५.१) from the foot
गङ्गागङ्गा (१.१) Ganga
इवइव like
ऊर्ध्वप्रवर्तिनीऊर्ध्वम्–प्रवर्तिनी flowing upwards
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
भौ ज्यो त्स्ना
सा वि भो र्व नो द्ग ता
नि र्या शे षा णा
द्ग ङ्गे वो र्ध्व प्र र्ति नी
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