अन्वयः
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तेन तप्यमानम् भुवनत्रयम् च मे विदितम्, अकामोपनतेन एनसा साधोः हृदयम् इव।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
विदितमिति॥ किंच, अकामेनानिच्छयोपनतेन प्रमादादागतेनैनसा पापेन साधोः सज्जनस्य हृदयमिव। तेन रक्षसा तप्यमानं संतप्यमानम्। तपेर्भौवादिकात्कर्मणि शानच्। भुवनत्रयं च मे विदितम्। मया ज्ञायत इत्यर्थः।
मतिबुद्धि- (अष्टाध्यायी ३.२.१८८ ) इत्यादिना वर्तमाने क्तः। क्तस्य च वर्तमाने (अष्टाध्यायी २.३.६७ ) इति षष्टी॥
Summary
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I am aware that the three worlds are being tormented by him (Ravana), just as the heart of a virtuous person is afflicted by a sin committed unintentionally.
सारांश
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मुझे ज्ञात है कि उसके कारण तीनों लोक वैसे ही दुखी हैं, जैसे अनचाहे हुए किसी पाप से किसी सज्जन पुरुष का हृदय संतप्त होता है।
पदच्छेदः
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| विदितम् | विदित (√विद्+क्त, १.१) | is known |
| तप्यमानम् | तप्यमान (√तप्+यक्+शानच्, १.१) | being tormented |
| च | च | and |
| तेन | तद् (३.१) | by him |
| मे | अस्मद् (४.१) | to me |
| भुवनत्रयम् | भुवन–त्रय (१.१) | the three worlds |
| अकामोपनतेन | अकाम–उपनत | by the unintentionally incurred |
| इव | इव | like |
| साधोः | साधु (६.१) | of a virtuous person |
| हृदयम् | हृदय (१.१) | the heart |
| एनसा | एनस् (३.१) | by sin |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | दि | तं | त | प्य | मा | नं | च |
| ते | न | मे | भु | व | न | त्र | यम् |
| अ | का | मो | प | न | ते | ने | व |
| सा | धो | र्हृ | द | य | मे | न | सा |
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