अन्वयः
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च स्तनान्तरविलम्बिनं कौस्तुभन्यासं बिभ्रत्या पद्म-व्यजन-हस्तया लक्ष्म्या (ताः) पर्युपास्यन्त।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
बिभ्रत्येति॥ किंच, स्तनयोरन्तरे मध्ये विलम्बिनं लम्बमानम्। न्यस्यत इति न्यासः। कौस्तुभ एव न्यासस्तम्। पत्या कौतुकान्न्यस्तम्। कौस्तुभमित्यर्थः। बिभ्रत्या पद्ममेव व्यजनं हस्ते यस्यास्तया लक्ष्म्या पर्युपास्यन्तोपासिताः ॥
Summary
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And in their dreams, they were attended upon by the goddess Lakshmi, who held a lotus-fan in her hand and wore the Kaustubha gem, which was hanging between her breasts.
सारांश
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वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि धारण किए हुए भगवान विष्णु की सेवा, हाथ में कमल का पंखा लिए लक्ष्मी जी कर रही थीं।
पदच्छेदः
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| बिभ्रत्या | बिभ्रत् (√भृ+शतृ, ३.१) | by her who was wearing |
| कौस्तुभन्यासम् | कौस्तुभ–न्यास (२.१) | the placement of the Kaustubha gem |
| स्तनान्तरविलम्बिनम् | स्तन–अन्तर–विलम्बिन् (२.१) | hanging between the breasts |
| पर्युपास्यन्त | पर्युपास्यन्त (परि+उप√आस् भावकर्मणोः लङ् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | they were served |
| लक्ष्म्या | लक्ष्मी (३.१) | by Lakshmi |
| च | च | and |
| पद्मव्यजनहस्तया | पद्म–व्यजन–हस्त (३.१) | by her who had a lotus-fan in her hand |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बि | भ्र | त्या | कौ | स्तु | भ | न्या | सं |
| स्त | ना | न्त | र | वि | ल | म्बि | नम् |
| प | र्यु | पा | स्य | न्त | ल | क्ष्म्या | च |
| प | द्म | व्य | ज | न | ह | स्त | या |
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