अन्वयः
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शय्यगतेन रामेण शातोदरी माता सैकताम्भोजबलिना शरत्कृशा जाह्नवी इव बभौ ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
शय्येति॥ शातोदरी गर्भमोचनात्कृशोदरी माता शय्यागतेन रामेण। सैकते पुलिने योऽम्भोजबलिः पद्मोपहारस्तेन शरदि कृशा जाह्नवी गङ्गेव। बभौ ॥
Summary
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The slender-waisted mother, with Rāma lying on the bed, shone like the river Ganges in autumn, which is thin and adorned with offerings of lotuses on its sandy banks.
सारांश
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शय्या पर लेटे हुए राम के साथ कृशोदरी माता कौशल्या वैसी ही सुशोभित हुईं जैसे शरद ऋतु में जल कम होने पर गंगा अपने बालू के तट पर अर्पित कमलों के साथ शोभा पाती है।
पदच्छेदः
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| शय्यगतेन | शय्या–गत (√गम्+क्त, ३.१) | by him who was on the bed |
| रामेण | राम (३.१) | by Rama |
| माता | मातृ (१.१) | the mother |
| शातोदरी | शात–उदर (१.१) | the slender-waisted one |
| बभौ | बभौ (√भा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shone |
| सैकताम्भोजबलिना | सैकत–अम्भोज–बलि (३.१) | with offerings of lotuses on the sandy banks |
| जाह्नवी | जाह्नवी (१.१) | the river Ganges |
| इव | इव | like |
| शरत्कृशा | शरद्–कृश (१.१) | thinned by autumn |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श | य्य | ग | ते | न | रा | मे | ण |
| मा | ता | शा | तो | द | री | ब | भौ |
| सै | क | ता | म्भो | ज | ब | लि | ना |
| जा | ह्न | वी | व | श | र | त्कृ | शा |
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