अन्वयः
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दिवौकसः भोगि-भोग-आसन-आसीनम्, तत्-फणा-मण्डल-उदर्चिः-मणि-द्योतित-विग्रहम् तम् ददृशुः ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
भोगीति॥ द्यौरोको येषां ते दिवौकसो देवाः। पृषोदरादित्वात्साधुः। यद्वा, -
दिवशब्दोऽदन्तोऽप्यस्ति। तथा च बुद्धचरिते-न शोभते तेन हि नो विना पुरं मरुत्वता वृत्रवधे यथा दिवम्इति । तत्र दिवु क्रीडादौइति धातोः इगुपध- (अष्टाध्यायी ३.१.१३५ ) इति कः। दिवमोक एषामिति विग्रहः। भोगिनः शेषस्य भोगः शरीरम्। भोगः सुखे स्त्र्यादिभृतावहेश्च फणकाययोः। इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२८ ) । स एवासनं सिंहासनम्। तत्रासीनमुपविष्टम्। आसोः शानच्। ईदासः (अष्टाध्यायी ७.२.८३ ) इतीकारादेशः। तस्य भोगिनः फणामण्डले य उदर्चिष उद्रश्मयो मणयस्तैर्द्योतितविग्रहं तं विष्णुं ददृशुः ॥
Summary
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The dwellers of heaven (gods) saw him (Vishnu), seated on the coils of the serpent (Shesha), his form illuminated by the gems blazing upwards from the circle of its hoods.
सारांश
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देवताओं ने शेषनाग की शय्या पर विराजमान भगवान विष्णु के दर्शन किए, जिनका शरीर नागराज के फणों की मणियों के प्रकाश से जगमगा रहा था।
पदच्छेदः
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| भोगिभोगासनासीनं | भोगिन्–भोग–आसन–आसीन (√आस्+शानच्, २.१) | seated on the seat of the serpent's coils |
| ददृशुः | ददृशुः (√दृश् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | saw |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| दिवौकसः | दिवौकस् (१.३) | the gods |
| तत्फणामण्डलोदर्चिर्मणिद्योतितविग्रहम् | तद्–फणा–मण्डल–उदर्चिस्–मणि–द्योतित–विग्रह (२.१) | whose form was illuminated by gems blazing from the circle of its (Shesha's) hoods |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भो | गि | भो | गा | स | ना | सी | नं |
| द | दृ | शु | स्तं | दि | वौ | क | सः |
| त | त्फ | णा | म | ण्ड | लो | द | र्चि |
| र्म | णि | द्यो | ति | त | वि | ग्र | हम् |
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