सुरगज इव दन्तैर्भग्नदैत्यासिधारै-
र्नय इव पणबन्धव्यक्तयोगैरुपायैः ।
हरिरिव युगदीर्घैर्दोर्भिरंशैस्तदीयैः
पतिरवनिपतीनां तैश्चकाशे चतुर्भिः ॥
सुरगज इव दन्तैर्भग्नदैत्यासिधारै-
र्नय इव पणबन्धव्यक्तयोगैरुपायैः ।
हरिरिव युगदीर्घैर्दोर्भिरंशैस्तदीयैः
पतिरवनिपतीनां तैश्चकाशे चतुर्भिः ॥
र्नय इव पणबन्धव्यक्तयोगैरुपायैः ।
हरिरिव युगदीर्घैर्दोर्भिरंशैस्तदीयैः
पतिरवनिपतीनां तैश्चकाशे चतुर्भिः ॥
अन्वयः
AI
भग्न-दैत्य-असि-धारैः दन्तैः सुरगजः इव, पण-बन्ध-व्यक्त-योगैः उपायैः नयः इव, युग-दीर्घैः दोर्भिः हरिः इव, तदीयैः तैः चतुर्भिः अंशैः अवनिपतीनां पतिः चकाशे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
सुरगज इति॥ भग्ना दैत्यानामसिधारा यैस्तैश्चतुर्भिर्दन्तैः सुरगज ऐरावत इव। पणबन्धेन फलसिद्ध्या व्यक्तयोगैरनुमितप्रयोगैरुपायैश्चतुर्भिः सामादिभिर्नयो नीतिरिव। युगपद्दीर्धैश्चतुर्भिर्दोर्भिर्भुजैर्हरिर्विष्णुरिव। तदीयैहरिसंबन्धिभिरंशैरंशभूतैश्चतुर्भिस्तैः पुत्रैरवनिपतीनां पती राजराजो दशरथः। चकाशे विदिद्युते ॥
Summary
AI
King Daśaratha shone with his four sons, just as the divine elephant Airāvata shines with four tusks that break demon swords, as statesmanship shines with four expedients manifest in treaties, and as Lord Viṣṇu shines with four long arms.
सारांश
AI
राजा दशरथ अपने उन चारों पुत्रों से वैसे ही शोभायमान हुए, जैसे ऐरावत हाथी अपने चार दांतों से, सफल राजनीति अपने चार उपायों से और श्रीहरि अपनी चार भुजाओं से शोभित होते हैं।
पदच्छेदः
AI
| सुरगजः | सुर–गज (१.१) | the divine elephant (Airāvata) |
| इव | इव | like |
| दन्तैः | दन्त (३.३) | with tusks |
| भग्नदैत्यासिधारैः | भग्न–दैत्य–असि–धारा (३.३) | which had broken the edges of the swords of demons |
| नयः | नय (√नी+अच्, १.१) | statesmanship |
| इव | इव | like |
| पणबन्धव्यक्तयोगैः | पण–बन्ध–व्यक्त–योग (३.३) | whose application is evident through the formation of treaties |
| उपायैः | उपाय (३.३) | with political expedients |
| हरिः | हरि (१.१) | Lord Viṣṇu |
| इव | इव | like |
| युगदीर्घैः | युग–दीर्घ (३.३) | long as a yoke |
| दोर्भिः | दोस् (३.३) | with arms |
| अंशैः | अंश (३.३) | with parts (sons) |
| तदीयैः | तदीय (३.३) | his |
| पतिः | पति (१.१) | the lord |
| अवनिपतीनां | अवनि–पति (६.३) | of the kings of the earth |
| तैः | तद् (३.३) | with those |
| चतुर्भिः | चतुर् (३.३) | four |
| चकाशे | चकाशे (√काश्र् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | shone |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सु | र | ग | ज | इ | व | द | न्तै | र्भ | ग्न | दै | त्या | सि | धा | रै |
| र्न | य | इ | व | प | ण | ब | न्ध | व्य | क्त | यो | गै | रु | पा | यैः |
| ह | रि | रि | व | यु | ग | दी | र्घै | र्दो | र्भि | रं | शै | स्त | दी | यैः |
| प | ति | र | व | नि | प | ती | नां | तै | श्च | का | शे | च | तु | र्भिः |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.