नाम्भसां कमलशोभिनां तथा शाखिनां च न परिश्रमच्छिदाम् ।
दर्शनेन लघुना यथा तयोः प्रीतिमापुरुभयोस्तपस्विनः ॥
नाम्भसां कमलशोभिनां तथा शाखिनां च न परिश्रमच्छिदाम् ।
दर्शनेन लघुना यथा तयोः प्रीतिमापुरुभयोस्तपस्विनः ॥
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
नेति॥ तप एषामस्तीति तपस्विनः।तपःसहस्राभ्यां विनीनी (अष्टाध्यायी ५.२.१०२ ) इति विनिप्रत्ययः। लघुना। त्रिष्विष्टेऽल्पे लघुः इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.३३ ) । तयोरुभयोः कर्मभूतयोः। दर्शनेन यथा प्रीतिमापुः। तथा कमलशोभिनामम्भसां दर्शनेन नापुः। परिश्रमच्छिदां शाखिनां दर्शनेन च नापुः ॥
पदच्छेदः
| न | न | Not |
| अम्भसाम् | अम्भस् (६.३) | of the waters |
| कमलशोभिनाम् | कमल–शोभिन् (६.३) | adorned with lotuses |
| तथा | तथा | so much |
| शाखिनाम् | शाखिन् (६.३) | of the trees |
| च | च | and |
| न | न | not |
| परिश्रमच्छिदाम् | परिश्रम–छिद् (६.३) | that remove fatigue |
| दर्शनेन | दर्शन (३.१) | by the sight |
| लघुना | लघु (३.१) | brief |
| यथा | यथा | as |
| तयोः | तद् (६.२) | of the two |
| प्रीतिम् | प्रीति (२.१) | pleasure |
| आपुः | आपुः (√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | derived |
| उभयोः | उभ (६.२) | of both |
| तपस्विनः | तपस्विन् (१.३) | the ascetics |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ना | म्भ | सां | क | म | ल | शो | भि | नां | त | था |
| शा | खि | नां | च | न | प | रि | श्र | म | च्छि | दाम् |
| द | र्श | ने | न | ल | घु | ना | य | था | त | योः |
| प्री | ति | मा | पु | रु | भ | यो | स्त | प | स्वि | नः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||