स्थाणुदग्धवपुषस्तपोवनं
प्राप्य दाशरथिरात्तकार्मुकः ।
विग्रहेण मदनस्य चारुणा
सोऽभवत्प्रतिनिधिर्न कर्मणा ॥
स्थाणुदग्धवपुषस्तपोवनं
प्राप्य दाशरथिरात्तकार्मुकः ।
विग्रहेण मदनस्य चारुणा
सोऽभवत्प्रतिनिधिर्न कर्मणा ॥
प्राप्य दाशरथिरात्तकार्मुकः ।
विग्रहेण मदनस्य चारुणा
सोऽभवत्प्रतिनिधिर्न कर्मणा ॥
अन्वयः
AI
दाशरथिः स्थाणुदग्धवपुषः मदनस्य तपोवनं प्राप्य चारुणा विग्रहेण तस्य प्रतिनिधिः अभवत्, कर्मणा न ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स्थाण्विति॥ स आत्तकार्मुकः। दशरथस्यापत्यं पुमान् दाशरथी रामः।
अत इञ् (अष्टाध्यायी ४.१.९५ ) इतीञ्प्रत्ययः। स्थाणुर्हरः। स्थाणुः कीले हरे स्थिरे इति विश्वः। तेन दग्धवपुषो मदनस्य तपोवनं प्राप्य चारुणा विग्रहेण कायेन। विग्रहः समरे काये इति विश्वः। प्रतिनिधिः प्रतिकगृतिः सदृशोऽभवत्, कर्मणा न पुनः, देहेन मदनसुन्दर इति भावः ॥
Summary
AI
Upon reaching the penance grove where Śiva had burnt the body of Kāmadeva, Rāma, holding his bow, became a substitute for the God of Love through his beautiful physical form, though not through his actions.
सारांश
AI
कामदेव के भस्म होने वाले वन में पहुँचकर धनुषधारी राम अपने अत्यंत सुंदर रूप के कारण साक्षात कामदेव के सुंदर प्रतिनिधि के समान दिखाई दिए।
पदच्छेदः
AI
| स्थाणुदग्धवपुषः | स्थाणु–दग्ध (√दह्+क्त)–वपुस् (६.१) | whose body was burnt by Śiva |
| तपोवनम् | तपस्–वन (२.१) | the penance grove |
| प्राप्य | प्राप्य (प्र√आप्+ल्यप्) | having reached |
| दाशरथिः | दशरथ (+इञ्, १.१) | the son of Daśaratha (Rāma) |
| आत्तकार्मुकः | आत्त (आ√दा+क्त)–कार्मुक (१.१) | holding a bow |
| विग्रहेण | विग्रह (३.१) | with a body/form |
| मदनस्य | मदन (६.१) | of the God of Love (Kāmadeva) |
| चारुणा | चारु (३.१) | with a beautiful |
| सः | तद् (१.१) | he |
| अभवत् | अभवत् (√भू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| प्रतिनिधिः | निधि (प्रति√निधि, १.१) | representative/substitute |
| न | न | not |
| कर्मणा | कर्मन् (३.१) | by action |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्था | णु | द | ग्ध | व | पु | ष | स्त | पो | व | नं |
| प्रा | प्य | दा | श | र | थि | रा | त्त | का | र्मु | कः |
| वि | ग्र | हे | ण | म | द | न | स्य | चा | रु | णा |
| सो | ऽभ | व | त्प्र | ति | नि | धि | र्न | क | र्म | णा |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.