अन्वयः
AI
अथ तयोः ज्यानिनादं गृह्णती बहुलक्षपाछविः चलकपालकुण्डला बलाकिनी निबिडा कालिका इव ताडका प्रादुरास ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
ज्येति॥ अथ तयोर्ज्यानिनादं गृह्णती जानती। शृण्वतीत्यर्थः। बहुलक्षपाछविः कृष्णपक्षरात्रिवर्णा।
बहुलः कृष्णपक्षे चइति विश्वः। चले कपाले एव कुण्डले यस्याः सा तथोक्ता ताडका। निबिडा सान्द्रा बलाकिनी बलाकावती। व्रीह्यादिभ्यश्च (अष्टाध्यायी ५.२.११६ ) इतीनिः। कालिकेव घनावलीव। कालिका योगिनीभेदे कार्ष्ण्ये गौर्यां घनावलौ इति विश्वः। प्रादुरास प्रादुर्बभूव॥
Summary
AI
Then, responding to the sound of their bowstrings, Tāḍakā appeared. She had the complexion of a dark night and wore moving skulls as earrings, looking like a dense row of dark clouds accompanied by cranes.
सारांश
AI
धनुष की टंकार सुनकर अमावस्या की रात्रि के समान काली ताड़का प्रकट हुई, जिसके हिलते हुए कपाल-कुंडल बादलों में उड़ते बगुलों के समान दिख रहे थे।
पदच्छेदः
AI
| ज्यानिनादम् | ज्या–निनाद (२.१) | the sound of the bowstring |
| अथ | अथ | then |
| गृह्णती | गृह्णती (√ग्रह्+शतृ+ङीप्, १.१) | catching/responding to |
| तयोः | तद् (६.२) | of those two |
| प्रादुरास | प्रादुरास (प्रादुर्√अस् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | appeared |
| बहुलक्षपाछविः | बहुल–क्षपा–छवि (१.१) | having the color of a dark night |
| ताडका | ताडका (१.१) | Tāḍakā |
| चलकपालकुण्डला | चल–कपाल–कुण्डल (१.१) | with earrings made of moving skulls |
| कालिका | कालिका (१.१) | a row of dark clouds |
| इव | इव | like |
| निबिडा | निबिड (१.१) | dense |
| बलाकिनी | बलाका (+इनि, १.१) | accompanied by cranes |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज्या | नि | ना | द | म | थ | गृ | ह्ण | ती | त | योः |
| प्रा | दु | रा | स | ब | हु | ल | क्ष | पा | छ | विः |
| ता | ड | का | च | ल | क | पा | ल | कु | ण्ड | ला |
| का | लि | के | व | नि | बि | डा | ब | ला | कि | नी |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.