आससाद मुनिरात्मनस्ततः
शिष्यवर्गपरिकल्पितार्हणम् ।
बद्धपल्लवपुटाञ्जलिद्रुमं
दर्शनोन्मुखमृगं तपोवनम् ॥

अन्वयः AI ततः मुनिः आत्मनः शिष्य-वर्ग-परिकल्पित-अर्हणम्, बद्ध-पल्लव-पुट-अञ्जलि-द्रुमम्, दर्शन-उन्मुख-मृगम् तपः-वनम् आससाद।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) आससादेति॥ ततो मुनि। शिष्यवर्गेण परिकल्पिता सज्जिताऽर्हणा पूजासामग्री यस्मिंस्तत्तथोक्तम्। बद्धाः पल्लवपुटा एवाञ्जलयो यैस्ते तथाभूता द्रुमा यस्मिंस्तत्तथोक्तम्। दर्शनेन मुनिदर्शनेनोन्मुखा मृगा यस्मिंस्तत्तत्। आत्मनस्तपोवनमाससाद। एतेन विशेषणत्रयेणातिथिसत्कारताच्छील्यविनयशान्तयः सूचिताः ॥
Summary AI Then the sage (Vishvamitra) reached his own penance grove, where worship had been prepared by his disciples, where the trees seemed to offer reverence with hands of folded leaf-buds, and where the deer were eager for his sight.
सारांश AI मुनि अपने उस तपोवन में पहुँचे जहाँ शिष्यों ने स्वागत की सामग्री जुटाई थी, वृक्षों ने पत्तों की अंजलि बाँध रखी थी और हिरण दर्शन के लिए उत्सुक थे।
पदच्छेदः AI
आससादआससाद (आ√सद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) reached
मुनिःमुनि (१.१) the sage
आत्मनःआत्मन् (६.१) his own
ततःततस् Then
शिष्यवर्गपरिकल्पितार्हणम्शिष्यवर्गपरिकल्पितार्हण (२.१) where worship was prepared by his group of disciples,
बद्धपल्लवपुटाञ्जलिद्रुमंबद्धपल्लवपुटाञ्जलिद्रुम (२.१) where the trees had their leaf-buds folded like hands in reverence,
दर्शनोन्मुखमृगंदर्शनोन्मुखमृग (२.१) where the deer were eager to see him,
तपोवनम्तपोवन (२.१) the penance grove.
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
सा मु नि रा त्म स्त तः
शि ष्य र्ग रि ल्पि ता र्ह णम्
द्ध ल्ल पु टा ञ्ज लि द्रु मं
र्श नो न्मु मृ गं पो नम्
About

Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.