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तत्र दीक्षितमृषिं ररक्षतु-
र्विघ्नतो दशरथात्मजौ शरैः ।
लोकमन्धतमसात्क्रमोदितौ
रश्मिभिः शशिदिवाकराविव ॥

अन्वयः AI तत्र दशरथ-आत्मजौ शरैः दीक्षितम् ऋषिम् विघ्नतः ररक्षतुः, इव क्रम-उदितौ शशि-दिवाकरौ रश्मिभिः लोकम् अन्धतमसात् (रक्षतः)।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) तत्रेति॥ तत्र तपोवने दशरथात्मजौ दीक्षितं दीक्षासंस्कृतमृषिं शरैर्विघ्नतो विघ्नेभ्यः क्रमेण पर्यायेण रात्रि-दिवसयोरुदितौ शशि-दिवाकरौ रश्मिभिरन्धतमसाद्गढध्वान्तात्। ध्वान्ते गाढेऽन्धतमसम् इत्यमरः (अमरकोशः १.८.३ ) अवसमन्धेभ्यस्तमसः (अष्टाध्यायी ५.४.७९ ) इति समासान्तोऽच्प्रत्ययः। लोकमिव। ररक्षतुः। रक्षणप्रवृत्तावभूतामित्यर्थः ॥
Summary AI There, the two sons of Dasharatha protected the consecrated sage from obstacles with their arrows, just as the moon and the sun, rising in succession, protect the world from blinding darkness with their rays.
सारांश AI दशरथ के दोनों पुत्रों ने यज्ञ में दीक्षित मुनि की बाधाओं से वैसे ही रक्षा की, जैसे सूर्य और चंद्रमा अपनी किरणों से संसार को अंधकार से बचाते हैं।
पदच्छेदः AI
तत्रतत्र There,
दीक्षितम्दीक्षित (√दीक्ष्+क्त, २.१) the consecrated
ऋषिंऋषि (२.१) sage
ररक्षतुःररक्षतुः (√रक्ष् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. द्वि.) protected
विघ्नतःविघ्नतस् from obstacles
दशरथात्मजौदशरथात्मज (१.२) the two sons of Dasharatha
शरैःशर (३.३) with arrows,
लोकम्लोक (२.१) the world
अन्धतमसात्अन्धतमस् (५.१) from blinding darkness.
क्रमोदितौक्रमोदित (१.२) risen in succession,
रश्मिभिःरश्मि (३.३) with their rays,
शशिदिवाकरौशशिदिवाकर (१.२) the moon and the sun
इवइव just as
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
त्र दी क्षि मृ षिं क्ष तु
र्वि घ्न तो था त्म जौ रैः
लो न्ध सा त्क्र मो दि तौ
श्मि भिः शि दि वा रा वि
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