वीक्ष्य वेदिमथ रक्तबिन्दुभि-
र्बन्धुजीवपृथुभिः प्रदूषिताम् ।
संभ्रमोऽभवदपोढकर्मणा-
मृत्विजां च्युतविकङ्कतस्रुचाम् ॥
वीक्ष्य वेदिमथ रक्तबिन्दुभि-
र्बन्धुजीवपृथुभिः प्रदूषिताम् ।
संभ्रमोऽभवदपोढकर्मणा-
मृत्विजां च्युतविकङ्कतस्रुचाम् ॥
र्बन्धुजीवपृथुभिः प्रदूषिताम् ।
संभ्रमोऽभवदपोढकर्मणा-
मृत्विजां च्युतविकङ्कतस्रुचाम् ॥
अन्वयः
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अथ बन्धुजीव-पृथुभिः रक्त-बिन्दुभिः प्रदूषिताम् वेदिम् वीक्ष्य, अपोढ-कर्मणाम् च्युत-विकङ्कत-स्रुचाम् ऋत्विजाम् संभ्रमः अभवत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
वीक्ष्येति॥ अथ बन्धुजीवपृथुभिर्बन्धुजीवककुसुमस्थूलैः।
रक्तकस्तु बन्धूको बन्धुजीवकः इत्यमरः (अमरकोशः २.४.७३ ) । रक्तबिन्दुभिः प्रदूषितामुपहतां वेदिं वीक्ष्य। अपोढकर्मणां त्यक्तव्यापाराणां च्युता विकङ्कतस्रुचो येभ्यस्तेषामृत्विजां याजकानां संभ्रमोऽभवत्। विकङ्कतग्रहणं खदिराद्युपलक्षणम्। स्रुवादीनां खदिरादिप्रकृतिकत्वात्। स्रुगादिपात्रस्यैव विकङ्कतप्रकृतिकत्वात्। विकङअकतः स्रुचां वृक्षः इत्यमरः (अमरकोशः २.४.७३ ) । यद्वा, -स्रुङ्मात्रस्य विकङ्कतप्रकृतिकत्वमस्तु; उभयत्रापि शास्त्रसंभवात्। यथाह भगवानापस्तम्बः-स्रुङ्मात्रस्य विकङ्कतप्रकृतिकत्वमस्तु; उभयत्रापि शास्त्रसंभवात्। यथाह भगवानापस्तम्बः-खादिरः स्रवः पर्णमयी जुहूराश्वत्थ्युपभृद्वैकङ्कतीः स्रुचो वा`इति ॥
Summary
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Then, upon seeing the sacrificial altar defiled by drops of blood as large as Bandhujiva flowers, panic arose among the priests, who abandoned their ritual actions and dropped the ladles made of Vikankata wood from their hands.
सारांश
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यज्ञ की वेदी को रक्त की बूंदों से अपवित्र देखकर ऋत्विज घबरा गए और उनके हाथों से यज्ञ पात्र गिर गए, जिससे अनुष्ठान में बाधा आई।
पदच्छेदः
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| वीक्ष्य | वीक्ष्य (वि√ईक्ष्+ल्यप्) | Upon seeing |
| वेदिम् | वेदि (२.१) | the altar |
| अथ | अथ | then, |
| रक्तबिन्दुभिः | रक्तबिन्दु (३.३) | by drops of blood |
| बन्धुजीवपृथुभिः | बन्धुजीवपृथु (३.३) | as large as Bandhujiva flowers, |
| प्रदूषिताम् | प्रदूषित (प्र√दूष्+क्त, २.१) | defiled, |
| संभ्रमः | संभ्रम (१.१) | panic |
| अभवत् | अभवत् (√भू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | arose |
| अपोढकर्मणाम् | अपोढकर्मन् (६.३) | of those who had abandoned their ritual actions, |
| ऋत्विजाम् | ऋत्विज् (६.३) | among the priests |
| च्युतविकङ्कतस्रुचाम् | च्युतविकङ्कतस्रुच् (६.३) | from whose hands the ladles made of Vikankata wood had fallen. |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वी | क्ष्य | वे | दि | म | थ | र | क्त | बि | न्दु | भि |
| र्ब | न्धु | जी | व | पृ | थु | भिः | प्र | दू | षि | ताम् |
| सं | भ्र | मो | ऽभ | व | द | पो | ढ | क | र्म | णा |
| मृ | त्वि | जां | च्यु | त | वि | क | ङ्क | त | स्रु | चाम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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