अन्वयः
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एवम् आप्तवचनात् सः काकपक्षकधरे अपि राघवे, त्रिदशगोपमात्रके कृष्णवर्त्मनि दाहशक्तिम् इव, पौरुषं श्रद्धधे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
एवमिति॥ एवमाप्तस्य मुनेर्वचनात्स जनकः काकपक्षकधरे बालेऽपि राघवे पुरुषस्य कर्म पौरुषं पराक्रमम्।
हायनान्तयुवादिभ्योऽण् (अष्टाध्यायी ५.१.१३० ) इति युवादित्वादण्। पौरुषं पुरुषस्योक्तं भावे कर्मणि तेजसिइति विश्वः। त्रिदशगोप इन्द्रगोपकीटः प्रमाणमस्य त्रिदशगोपमात्रः। प्रमाणे द्वयसच्- (अष्टाध्यायी ५.२.३७ ) इत्यादिना मात्रच्प्रत्ययः। ततः स्वार्थे कप्रत्ययः। तस्मिन्कृष्णवर्त्मनि वह्नौ दाहशक्तिमिव। श्रद्वधे विश्वस्तवान् ॥
Summary
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Thus, due to the reliable words of the sage, the King believed in the prowess of Raghava, though he still wore the side-locks of childhood, just as one believes in the burning power of fire even when it is as small as an Indragopa insect.
सारांश
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ऋषि के विश्वसनीय वचनों के कारण जनक ने राम की कोमल आयु में भी वैसे ही पराक्रम की श्रद्धा की, जैसे अग्नि के छोटे कण में भी उसकी पूर्ण दाहक शक्ति पर विश्वास किया जाता है।
पदच्छेदः
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| एवम् | एवम् | thus |
| आप्तवचनात् | आप्त–वचन (५.१) | from the words of a reliable person |
| सः | तद् (१.१) | he (Janaka) |
| पौरुषं | पुरुष (+अण्, २.१) | prowess |
| काकपक्षकधरे | काक–पक्षक–धृ (+अच्, ७.१) | wearing side-locks of hair |
| अपि | अपि | even though |
| राघवे | राघव (७.१) | in Rama |
| श्रद्धधे | श्रद्धधे (श्रत्√धा कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | believed |
| त्रिदशगोपमात्रके | त्रिदशगोप–मात्रक (७.१) | as small as an Indragopa insect |
| दाहशक्तिम् | दाह–शक्ति (२.१) | burning power |
| इव | इव | like |
| कृष्णवर्त्मनि | कृष्ण–वर्त्मन् (७.१) | in fire |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | व | मा | प्त | व | च | ना | त्स | पौ | रु | षं |
| का | क | प | क्ष | क | ध | रे | ऽपि | रा | घ | वे |
| श्र | द्ध | धे | त्रि | द | श | गो | प | मा | त्र | के |
| दा | ह | श | क्ति | मि | व | कृ | ष्ण | व | र्त्म | नि |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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