दृष्टसारमथ रुद्रकार्मुके
वीर्यशुल्कमभिनन्द्य मैथिलः ।
राघवाय तनयामयोनिजां
रूपिणीं श्रियमिव न्यवेदयत् ॥

अन्वयः AI अथ मैथिलः रुद्रकार्मुके दृष्टसारं राघवं अभिनन्द्य अयोनिजां तनयां रूपिणीं श्रियं इव न्यवेदयत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) दृष्टेति॥ अथ मैथइलो जनको रुद्रकार्मुके दृष्टः सारः स्थिरांशो यस्य दद्दृष्टसारम्। सारो बले स्थिरांशे च इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१७९ ) । वीर्यमेव शुल्कम्। धनुर्भङ्गरूपमित्यर्थः। अभिनन्द्य। राघवाय रामाय। अयोनिजां देवयजनसंभवां तनयां सीतां रूपिणीं श्रियमिव साक्षाल्लक्ष्मीमिव न्यवेदयदर्पितवान्। वाचेति शेषः ॥
Summary AI After Rāma's strength was witnessed through the breaking of Śiva's bow, King Janaka, having congratulated him, offered his daughter Sītā—who was not born of a womb—to Rāma, as if she were the goddess Lakṣmī herself in embodied form.
सारांश AI शिव के धनुष पर राम का पराक्रम देख और उसे ही कन्या के मूल्य के रूप में स्वीकार कर, राजा जनक ने अपनी अयोनिजा पुत्री सीता को साक्षात् लक्ष्मी की तरह राम को सौंप दिया।
पदच्छेदः AI
दृष्टसारम्दृष्टसार (२.१) one whose strength was witnessed
अथअथ then
रुद्रकार्मुकेरुद्रकार्मुक (७.१) on the bow of Śiva
वीर्यशुल्कम्वीर्यशुल्क (२.१) the prize for valor
अभिनन्द्यअभिनन्द्य (अभि√नन्द्+ल्यप्) having congratulated
मैथिलःमैथिल (१.१) the King of Mithilā (Janaka)
राघवायराघव (४.१) to the descendant of Raghu (Rāma)
तनयाम्तनया (२.१) daughter
अयोनिजाम्योनि (२.१) not born from a womb
रूपिणीम्रूप (+इनि, २.१) embodied
श्रियम्श्री (२.१) the Goddess Lakṣmī
इवइव like
न्यवेदयत्न्यवेदयत् (नि√विद् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) offered/announced
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
दृ ष्ट सा रु द्र का र्मु के
वी र्य शु ल्क भि न्द्य मै थि लः
रा वा या यो नि जां
रू पि णीं श्रि मि न्य वे यत्
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