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तौ पितुर्नयनजेन वारिणा
किंचिदुक्षितशिखण्डकावुभौ ।
धन्विनौ तमृषिमन्वगच्छतां
पौरदृष्टिकृतमार्गतोरणौ ॥

अन्वयः AI पितुः नयनजेन वारिणा किंचित् उक्षित-शिखण्डकौ धन्विनौ तौ उभौ पौर-दृष्टि-कृत-मार्ग-तोरणौ तम् ऋषिम् अन्वगच्छताम् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) ताविति॥ पितुर्नयनजेन वारिणा किंचिदुक्षितशिखण्डकावीषत्सिक्तचूडौ। शिखा चूडा शिखण्डः स्यात् इत्यमरः। शेषाद्विभाषा (अष्टाध्यायी ५.४.१५४ ) इति कप्प्रत्ययः। धन्विनौ तावुभौ। पौरदृष्टिभिः कृतानि मार्गतोरणानि संपाद्यानि कुवलयानि ययोस्तौ तथोक्तौ। संघशो निरीक्ष्यमाणावित्यर्थः। तमृषिमन्वगच्छताम् ॥
Summary AI Both the archers, their locks slightly moistened by their father's tears, followed the sage. As they walked, the gazes of the citizens formed a continuous archway of welcome along their path.
सारांश AI पिता के आंसुओं से भीगे बालों वाले वे दोनों धनुर्धारी मुनि के पीछे चल दिए, जबकि नगरवासियों की टकटकी उनके मार्ग के वंदनवारों जैसी लग रही थी।
पदच्छेदः AI
तौतद् (१.२) those two
पितुःपितृ (६.१) of the father
नयनजेननयनजन (३.१) born from the eyes
वारिणावारि (३.१) with water
किंचित्किंचित् slightly
उक्षितशिखण्डकौउक्षित (√उक्ष्+क्त)शिखण्डक (१.२) whose locks of hair were moistened
उभौउभ (१.२) both
धन्विनौधन्वन् (+इनि, १.२) the two archers
तम्तद् (२.१) that
ऋषिम्ऋषि (२.१) sage
अन्वगच्छताम्अन्वगच्छताम् (अनु√गम् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. द्वि.) followed
पौरदृष्टिकृतमार्गतोरणौपौरदृष्टिकृतमार्गतोरण (१.२) for whom the eyes of the citizens served as archways on the road
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
तौ पि तु र्न जे वा रि णा
किं चि दु क्षि शि ण्ड का वु भौ
न्वि नौ मृ षि न्व च्छ तां
पौ दृ ष्टि कृ मा र्ग तो णौ
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