एवमात्तरतिरात्मसंभवां-
स्तान्निवेश्य चतुरोऽपि तत्र सः ।
अध्वसु त्रिषु विसृष्टमैथिलः
स्वां पुरीं दशरथो न्यवर्तत ॥
एवमात्तरतिरात्मसंभवां-
स्तान्निवेश्य चतुरोऽपि तत्र सः ।
अध्वसु त्रिषु विसृष्टमैथिलः
स्वां पुरीं दशरथो न्यवर्तत ॥
स्तान्निवेश्य चतुरोऽपि तत्र सः ।
अध्वसु त्रिषु विसृष्टमैथिलः
स्वां पुरीं दशरथो न्यवर्तत ॥
अन्वयः
AI
एवम् आत्तरतिः सः दशरथः तत्र तान् चतुरः अपि आत्मसंभवान् निवेश्य त्रिषु अध्वसु विसृष्टमैथिलः स्वां पुरीं न्यवर्तत ॥
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
एवमिति॥ एवमात्तरतिरनुरागवान् स दशरथस्तांश्चतुरोऽप्यात्मसंभवान् पुत्रांस्तत्र, मिथिलायां निवेश्य विवाह्य।
निवेशः शिबिरोद्वाहविन्यासेषु प्रकीर्तितः इति विश्वः। त्रिष्वध्वसु प्रयाणेषु सत्सु विसृष्टमैथिलः सन्। स्वां पुरीं न्यवर्तत। उद्देशक्रियापेक्षया कर्मत्वं पुर्याः ॥
Summary
AI
Having thus found joy and settled his four sons in their respective places, King Daśaratha, after bidding farewell to the King of Mithilā at the junction of three paths, returned to his own city.
सारांश
AI
अपने चारों पुत्रों का विवाह संपन्न कराने के बाद और राजा जनक को विदा कर, राजा दशरथ अत्यंत प्रसन्न होकर अपनी नगरी अयोध्या की ओर लौट पड़े।
पदच्छेदः
AI
| एवम् | एवम् | thus |
| आत्तरतिः | आत्त–रति (१.१) | having found joy |
| सः | तद् (१.१) | he |
| दशरथः | दशरथ (१.१) | Daśaratha |
| तत्र | तत्र | there |
| तान् | तद् (२.३) | those |
| चतुरः | चतुर् (२.३) | four |
| अपि | अपि | even |
| आत्मसंभवान् | आत्मन्–संभव (सम्√भू+अप्, २.३) | sons |
| निवेश्य | निवेश्य (नि√विश्+णिच्+ल्यप्) | having settled |
| त्रिषु | त्रि (७.३) | in three |
| अध्वसु | अध्वन् (७.३) | paths |
| विसृष्टमैथिलः | वि–सृष्ट (√सृज्+क्त)–मैथिल (१.१) | having bid farewell to Janaka |
| स्वाम् | स्व (२.१) | his own |
| पुरीम् | पुरी (२.१) | city |
| न्यवर्तत | न्यवर्तत (नि√वृत् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | returned |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | व | मा | त्त | र | ति | रा | त्म | सं | भ | वां |
| स्ता | न्नि | वे | श्य | च | तु | रो | ऽपि | त | त्र | सः |
| अ | ध्व | सु | त्रि | षु | वि | सृ | ष्ट | मै | थि | लः |
| स्वां | पु | रीं | द | श | र | थो | न्य | व | र्त | त |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.