तत्प्रतीपपवनादि वैकृतं
प्रेक्ष्य शान्तिमधिकृत्य कृत्यवित् ।
अन्वयुङ्क्त गुरुमीश्वरः क्षितेः
स्वन्तमित्यलघयत्स तद्व्यथाम् ॥
तत्प्रतीपपवनादि वैकृतं
प्रेक्ष्य शान्तिमधिकृत्य कृत्यवित् ।
अन्वयुङ्क्त गुरुमीश्वरः क्षितेः
स्वन्तमित्यलघयत्स तद्व्यथाम् ॥
प्रेक्ष्य शान्तिमधिकृत्य कृत्यवित् ।
अन्वयुङ्क्त गुरुमीश्वरः क्षितेः
स्वन्तमित्यलघयत्स तद्व्यथाम् ॥
अन्वयः
AI
कृतिवित् क्षितेः ईश्वरः तत् प्रतीपपवनादि वैकृतं प्रेक्ष्य शान्तिम् अधिकृत्य गुरुम् अन्वयुङ्क्त सः स्वन्तम् इति तद्व्यथाम् अलघयत् ॥
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तदिति॥ तत्प्रतीपपवनादि वैकृतं दुर्निमित्तं प्रेक्ष्य कृत्यवित् कार्यज्ञः क्षितेरीश्वरः शान्तिमनर्थनिवृत्तिमधिकृत्योद्दिश्य गुरुं वसिष्ठमन्वयुङ्क्तापृच्छत्।
प्रश्नोऽनुयोगः पृच्छा च इत्यमरः (अमरकोशः १.६.१० ) । स गुरुः स्वन्तं शुभोदर्कं भावीति तस्य राज्ञो व्यथआमलघयल्लघूकृतवान् ॥
Summary
AI
King Daśaratha, knowing his duty, saw the portents like adverse winds and questioned his preceptor Vasiṣṭha regarding propitiatory rites. Vasiṣṭha lessened the King's anxiety by saying it would end well.
सारांश
AI
प्रतिकूल वायु आदि अपशकुनों को देखकर नीतिज्ञ राजा दशरथ ने शान्ति के विषय में गुरु वशिष्ठ से पूछा। गुरु ने 'इसका अंत शुभ होगा' कहकर राजा की व्यथा दूर की।
पदच्छेदः
AI
| कृत्यवित् | कृत्य–विद् (१.१) | knowing what is to be done |
| क्षितेः | क्षिति (६.१) | of the earth |
| ईश्वरः | ईश्वर (१.१) | the lord (Daśaratha) |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| प्रतीपपवनादि | प्रतीप–पवन–आदि (२.१) | adverse wind etc. |
| वैकृतम् | विकृत (२.१) | portent |
| प्रेक्ष्य | प्रेक्ष्य (प्र√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| शान्तिम् | शान्ति (२.१) | propitiatory rite |
| अधिकृत्य | अधिकृत्य (अधि√कृ+ल्यप्) | referring to |
| गुरुम् | गुरु (२.१) | the preceptor (Vasiṣṭha) |
| अन्वयुङ्क्त | अन्वयुङ्क्त (अनु√युज् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | questioned |
| सः | तद् (१.१) | he (Vasiṣṭha) |
| स्वन्तम् | सु–अन्त (१.१) | ending well |
| इति | इति | thus |
| तद्व्यथाम् | तद्–व्यथा (२.१) | his anxiety |
| अलघयत् | अलघयत् (√लघु +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | lessened |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त्प्र | ती | प | प | व | ना | दि | वै | कृ | तं |
| प्रे | क्ष्य | शा | न्ति | म | धि | कृ | त्य | कृ | त्य | वित् |
| अ | न्व | यु | ङ्क्त | गु | रु | मी | श्व | रः | क्षि | तेः |
| स्व | न्त | मि | त्य | ल | घ | य | त्स | त | द्व्य | थाम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.