अन्वयः
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यः दक्षिणश्रवणसंस्थितेन अक्षबीजवलयेन क्षत्रियान्तकरणैकविंशतेः व्याजपूर्वगणनम् इव उद्वहन् निर्बभौ ॥
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अक्षेति॥ यो भार्गवो दक्षिणश्रवणे संस्थितेनाऽक्षबीजवलयेनाक्षमालया क्षत्रियान्तकरणानां क्षत्रियवधानामेकविंशतेरेकविंशतिसंख्याया व्याजोऽक्षमालारूपः पूर्वो यस्यास्तां गणनामुद्वहन्निव निर्बभौ ॥
Summary
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He shone, wearing a rosary of seeds on his right ear, as if he were performing a preliminary count on a pretext for the twenty-one times he had destroyed the Kṣatriyas.
सारांश
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उनके दाहिने कान पर लटकी हुई रुद्राक्ष की माला ऐसी सुशोभित हो रही थी, मानो वह इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार करने की अपनी प्रतिज्ञा की गणना कर रही हो।
पदच्छेदः
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| यः | यद् (१.१) | who |
| दक्षिणश्रवणसंस्थितेन | दक्षिण–श्रवण–सम्–स्थित (√स्था+क्त, ३.१) | placed on the right ear |
| अक्षबीजवलयेन | अक्ष–बीज–वलय (३.१) | with a rosary of seeds |
| क्षत्रियान्तकरणैकविंशतेः | क्षत्रिय–अन्त–करण–एकविंशति (६.१) | of the twenty-one times of destroying Kṣatriyas |
| व्याजपूर्वगणनम् | व्याज–पूर्व–गणन (२.१) | a preliminary counting on a pretext |
| इव | इव | as if |
| उद्वहन् | उद्वहन् (उद्√वह+शतृ, १.१) | carrying |
| निर्बभौ | निर्बभौ (निस्√भा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shone |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | क्ष | बी | ज | व | ल | ये | न | नि | र्ब | भौ |
| द | क्षि | ण | श्र | व | ण | सं | स्थि | ते | न | यः |
| क्ष | त्रि | या | न्त | क | र | णै | क | विं | श | ते |
| र्व्या | ज | पू | र्व | ग | ण | ना | मि | वो | द्व | हन् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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