क्षत्रजातमपकारवैरि मे
तन्निहत्य बहुशः शमं गतः ।
सुप्तसर्प इव दण्डघट्टना-
द्रोषितोऽस्मि तव विक्रमश्रवात् ॥
क्षत्रजातमपकारवैरि मे
तन्निहत्य बहुशः शमं गतः ।
सुप्तसर्प इव दण्डघट्टना-
द्रोषितोऽस्मि तव विक्रमश्रवात् ॥
तन्निहत्य बहुशः शमं गतः ।
सुप्तसर्प इव दण्डघट्टना-
द्रोषितोऽस्मि तव विक्रमश्रवात् ॥
अन्वयः
AI
अपकारवैरि मे क्षत्रजातं बहुशः निहत्य शमं गतः अस्मि । तव विक्रमश्रवात् दण्डघट्टनात् सुप्तसर्प इव रोषितः अस्मि ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
क्षत्रेति॥ क्षत्रजातं क्षत्रजातिर्मेऽयकारेण पितृवधरूपेण वैरि द्वेषि। तत् क्षत्रजातं बहुश एकविंशतिवारान्निहत्य शमं गतोऽस्मि। तथापि सुप्तसर्पो दण्डघट्टनादिव तव विक्रमस्य श्रवादाकर्णनाद्रोषितो रोषं प्रापितोऽस्मि ॥
Summary
AI
Paraśurāma declared that after repeatedly destroying the Kṣatriya race—his enemies for the injury done to his father—he had finally attained peace. However, hearing of Rāma's extraordinary prowess had provoked him once more. He compared himself to a sleeping serpent that has been rudely awakened and enraged by the strike of a staff, indicating that Rāma's fame had disturbed his quietude and reignited his warrior spirit.
सारांश
AI
अपकार करने वाला क्षत्रिय कुल मेरा शत्रु था, जिसे मारकर मैं शांत हो गया था। किंतु तुम्हारे पराक्रम की चर्चा सुनकर मैं वैसे ही जाग उठा हूँ जैसे डंडे की चोट से सोता हुआ सर्प क्रोधित हो जाता है।
पदच्छेदः
AI
| क्षत्रजातम् | क्षत्र–जात (२.१) | the Kṣatriya race |
| अपकारवैरि | अपकार–वैरिन् (२.१) | enemy due to injury |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| तद् | तद् (२.१) | that |
| निहत्य | निहत्य (नि√हन्+ल्यप्) | having destroyed |
| बहुशः | बहुशः | many times |
| शमम् | शम (२.१) | tranquility |
| गतः | गत (√गम्+क्त, १.१) | attained |
| अस्मि | अस्मि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I am |
| सुप्तसर्प | सुप्त–सर्प (१.१) | a sleeping snake |
| इव | इव | like |
| दण्डघट्टनात् | दण्ड–घट्टन (५.१) | from the stroke of a staff |
| रोषितः | रोषित (√रुष्+क्त, १.१) | enraged |
| अस्मि | अस्मि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I am |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| विक्रमश्रवात् | विक्रम–श्रव (५.१) | from hearing of the prowess |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्ष | त्र | जा | त | म | प | का | र | वै | रि | मे |
| त | न्नि | ह | त्य | ब | हु | शः | श | मं | ग | तः |
| सु | प्त | स | र्प | इ | व | द | ण्ड | घ | ट्ट | ना |
| द्रो | षि | तो | ऽस्मि | त | व | वि | क्र | म | श्र | वात् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.