बिभ्रतोऽस्त्रमचलेऽप्यकुण्ठितं
द्वौ रिपू मम मतौ समागसौ ।
धेनुवत्सहरणाञ्च हैहय-
स्त्वं च कीर्तिमपहर्तुमुद्यतः ॥
बिभ्रतोऽस्त्रमचलेऽप्यकुण्ठितं
द्वौ रिपू मम मतौ समागसौ ।
धेनुवत्सहरणाञ्च हैहय-
स्त्वं च कीर्तिमपहर्तुमुद्यतः ॥
द्वौ रिपू मम मतौ समागसौ ।
धेनुवत्सहरणाञ्च हैहय-
स्त्वं च कीर्तिमपहर्तुमुद्यतः ॥
अन्वयः
AI
अचले अपि अकुण्ठितम् अस्त्रम् बिभ्रतः मम धेनुवत्सहरणात् हैहयः त्वं च कीर्तिम् अपहर्तुम् उद्यतः इति द्वौ समागसौ रिपू मतौ ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
बिभ्रत इति॥ अचले क्रौञ्चादावप्यकुण्ठितमस्त्रं बिभ्रतो मम द्वौ समागसौ तुल्यापराधौ रिपू मतौ। धेनोः पितृहोमधेनोर्वत्सस्य हरणाद्धेतोर्हैहयः कार्तवीर्यश्च। कीर्तिमपहर्तुमुद्यत उद्युक्तस्त्वं च। वत्सहरणे भारतश्लोकः-
प्रमत्तश्चाश्रमात्तस्य होमधेन्वास्ततो बलात्। जहार वत्सं क्रोशन्त्या बभञ्ज च महाद्रुमान् ॥ इति ॥
Summary
AI
Paraśurāma, whose weapons remain unblunted even against mountains, considers two enemies equally guilty of offending him. One is the Haihaya king, who stole his father's calf, and the other is Rāma, who is now striving to steal his fame. By equating the loss of his fame to the theft of his family's sacred property, Paraśurāma justifies his hostility toward the young prince.
सारांश
AI
पर्वत पर भी अमोघ अस्त्र चलाने वाले मेरे दो ही मुख्य अपराधी शत्रु हैं—एक वह कार्तवीर्य अर्जुन जिसने कामधेनु का हरण किया था, और दूसरे तुम जो मेरी कीर्ति छीनने को उद्यत हो।
पदच्छेदः
AI
| बिभ्रतः | बिभ्रत् (√भृ+शतृ, ६.१) | of me who bears |
| अस्त्रम् | अस्त्र (२.१) | weapon |
| अचले | अचल (७.१) | against a mountain |
| अपि | अपि | even |
| अकुण्ठितम् | अन्–कुण्ठित (२.१) | unblunted |
| द्वौ | द्वि (१.२) | two |
| रिपू | रिपु (१.२) | enemies |
| मम | अस्मद् (६.१) | my |
| मतौ | मत (√मन्+क्त, १.२) | considered |
| समागसौ | सम्–आगस् (१.२) | equally guilty |
| धेनुवत्सहरणात् | धेनु–वत्स–हरण (५.१) | due to the stealing of the calf of the cow |
| हैहयः | हैहय (१.१) | Kārtavīryārjuna (the Haihaya king) |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| च | च | and |
| कीर्तिम् | कीर्ति (२.१) | fame |
| अपहर्तुम् | अपहर्तुम् (अप√हृ+तुमुन्) | to steal |
| उद्यतः | उद्यत (उत्√यम्+क्त, १.१) | striving |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| बि | भ्र | तो | ऽस्त्र | म | च | ले | ऽप्य | कु | ण्ठि | तं |
| द्वौ | रि | पू | म | म | म | तौ | स | मा | ग | सौ |
| धे | नु | व | त्स | ह | र | णा | ञ्च | है | ह | य |
| स्त्वं | च | की | र्ति | म | प | ह | र्तु | मु | द्य | तः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.