क्षत्रियान्तकरणोऽपि विक्रम-
स्तेन मामवति नाजिते त्वयि ।
पावकस्य महिमा स गण्यते
कक्षवज्ज्वलति सागरेऽपि यः ॥
क्षत्रियान्तकरणोऽपि विक्रम-
स्तेन मामवति नाजिते त्वयि ।
पावकस्य महिमा स गण्यते
कक्षवज्ज्वलति सागरेऽपि यः ॥
स्तेन मामवति नाजिते त्वयि ।
पावकस्य महिमा स गण्यते
कक्षवज्ज्वलति सागरेऽपि यः ॥
अन्वयः
AI
क्षत्रियान्तकरणः अपि मे विक्रमः तेन अजिते त्वयि माम् न अवति । यः कक्षवत् सागरे अपि ज्वलति सः पावकस्य महिमा गण्यते ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
क्षत्रियेति॥ तेन कारणेन। क्रियते येनासौ करणः। क्षत्रियान्तस्य करणोऽपि विक्रमः। त्वय्यजिते मां नावति न प्रीणाति। तथा हि-पावकस्याग्नेर्महिमा स गण्यते यः कक्षवत् कक्ष इव।
तत्र तस्येव (अष्टाध्यायी ५.१.११६ ) इति सप्तम्यर्थे वतिः। सागरेऽपि। ज्वलति ॥
Summary
AI
Paraśurāma stated that his prowess, though famous for destroying the Kṣatriya race, does not satisfy him as long as Rāma remains unconquered. He explained that the true greatness of fire is recognized only when it can burn even in the middle of the ocean, just as it burns through dry grass. Similarly, his own power is only truly validated if it can overcome a formidable opponent like Rāma.
सारांश
AI
क्षत्रियों का अंत करने वाला मेरा पराक्रम तब तक पूर्ण नहीं माना जाएगा जब तक मैं तुम्हें नहीं जीत लेता। अग्नि की वास्तविक महिमा तभी है जब वह घास-फूस के साथ समुद्र में भी जल सके।
पदच्छेदः
AI
| क्षत्रियान्तकरणः | क्षत्रिय–अन्त–करण (√कृ+ल्युट्, १.१) | destroyer of Kṣatriyas |
| अपि | अपि | even |
| विक्रमः | विक्रम (वि√क्रम, १.१) | prowess |
| तेन | तद् (३.१) | therefore |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| न | न | not |
| अवति | अवति (√अव् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | protects/satisfies |
| अजिते | अन्–अजित (√जि+क्त, ७.१) | unconquered |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | in you |
| पावकस्य | पावक (६.१) | of fire |
| महिमा | महिमन् (१.१) | greatness |
| सः | तद् (१.१) | that |
| गण्यते | गण्यते (√गण् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is considered |
| कक्षवत् | कक्ष (२.१)–वत् | like dry grass |
| ज्वलति | ज्वलति (√ज्वल् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | burns |
| सागरे | सागर (७.१) | in the ocean |
| अपि | अपि | even |
| यः | यद् (१.१) | which |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्ष | त्रि | या | न्त | क | र | णो | ऽपि | वि | क्र | म |
| स्ते | न | मा | म | व | ति | ना | जि | ते | त्व | यि |
| पा | व | क | स्य | म | हि | मा | स | ग | ण्य | ते |
| क | क्ष | व | ज्ज्व | ल | ति | सा | ग | रे | ऽपि | यः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.