तद्गतिं मतिमतां वरेप्सितां
पुण्यतीर्थगमनाय रक्ष मे ।
पीडयिषअयति न मां खिलीकृता
स्वर्गपद्धतिरभोगलोलुपम् ॥

अन्वयः AI तत्, मतिमताम् वर, मे ईप्सिताम् गतिम् पुण्यतीर्थगमनाय रक्ष । खिलीकृता स्वर्गपद्धतिः अभोगलोलुपम् माम् न पीडयिष्यति ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) तदिति॥ तत्तस्मात्कारणात्, हे मतिमतां वर! पुण्यतीर्थगमनायाप्तुमिष्टामीप्सितां मे गतिं रक्ष पालय। किंतु खिलीकृता दुर्गमीकृतापि स्वर्ग-द्धतिरभोगलोलुपं भोगनिःस्पृहं मां न पीडयिष्यति। अतस्तामेव जह्रीत्यर्थः ॥
Summary AI "Therefore, O best among the wise, spare my power of movement, which I desire for pilgrimages to holy sites. The path to heaven being blocked will not pain me, as I am not greedy for its enjoyments."
सारांश AI बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राम, तीर्थयात्रा के लिए मेरी गति सुरक्षित रखें। भोगों की इच्छा न होने के कारण स्वर्ग के मार्ग का अवरुद्ध होना मुझे पीड़ा नहीं देगा।
पदच्छेदः AI
तत्तत् therefore
गतिम्गति (२.१) power of movement
मतिमताम्मतिमान् (६.३) of the wise
वरवर (८.१) O best
ईप्सिताम्ईप्सित (√आप्+सन्+क्त, २.१) desired
पुण्यतीर्थगमनायपुण्यतीर्थगमन (४.१) for going to holy places
रक्षरक्ष (√रक्ष् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) preserve
मेअस्मद् (६.१) my
पीडयिष्यतिपीडयिष्यति (√पीड् +णिच्+स्य कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) will pain
not
माम्अस्मद् (२.१) me
खिलीकृताखिलीकृत (√खिलीकृ+क्त, १.१) made barren/obstructed
स्वर्गपद्धतिःस्वर्गपद्धति (१.१) the path to heaven
अभोगलोलुपम्भोगलोलुप (२.१) me who is not greedy for enjoyments
छन्दः रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३
द्ग तिं ति तां रे प्सि तां
पु ण्य ती र्थ ना क्ष मे
पी यि ति मां खि ली कृ ता
स्व र्ग द्ध ति भो लो लु पम्
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