राघवोऽपि चरणौ तपोनिधेः
क्षम्यतामिति वदन्समस्पृशत् ।
निर्जितेषु तरसा तरस्विनां
शत्रुषु प्रणतिरेव कीर्तये ॥
राघवोऽपि चरणौ तपोनिधेः
क्षम्यतामिति वदन्समस्पृशत् ।
निर्जितेषु तरसा तरस्विनां
शत्रुषु प्रणतिरेव कीर्तये ॥
क्षम्यतामिति वदन्समस्पृशत् ।
निर्जितेषु तरसा तरस्विनां
शत्रुषु प्रणतिरेव कीर्तये ॥
अन्वयः
AI
राघवः अपि 'क्षम्यताम्' इति वदन् तपोनिधेः चरणौ समस्पृशत् । तरस्विनाम् तरसा निर्जितेषु शत्रुषु प्रणतिः एव कीर्तये (भवति) ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
राघव इति॥ राघवोऽपि क्षम्यतामिति वदंस्तपोनिधेर्भार्गवस्य चरणौ समस्पृशत् प्रणनाम। तथा हि-तरस्विनां बलवतां तरसा बलेन निर्जितेषु शत्रुषु प्रणतिरेव कीर्तये। भवतीति शेषः ॥
Summary
AI
Raghava, saying "Forgive me," touched the feet of the sage, that treasure of penance. For the powerful, showing respect to enemies conquered by force is itself a source of glory.
सारांश
AI
राम ने तपस्वी परशुराम के चरणों को स्पर्श कर क्षमा माँगी। बलवानों के लिए पराजित शत्रुओं के प्रति विनम्रता दिखाना उनके यश को बढ़ाने वाला ही होता है।
पदच्छेदः
AI
| राघवः | राघव (१.१) | Raghava |
| अपि | अपि | also |
| चरणौ | चरण (२.२) | the two feet |
| तपोनिधेः | तपोनिधि (६.१) | of the treasure of penance |
| क्षम्यताम् | क्षम्यताम् (√क्षम् भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | let it be forgiven |
| इति | इति | thus |
| वदन् | वदत् (√वद्+शतृ, १.१) | saying |
| समस्पृशत् | समस्पृशत् (सम्√स्पृश् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | touched |
| निर्जितेषु | निर्जित (निर्√जि+क्त, ७.३) | towards those who have been conquered |
| तरसा | तरस् (३.१) | by force |
| तरस्विनाम् | तरस्विन् (६.३) | of the powerful |
| शत्रुषु | शत्रु (७.३) | towards enemies |
| प्रणतिः | प्रणति (१.१) | a bow |
| एव | एव | alone |
| कीर्तये | कीर्ति (४.१) | for fame |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | घ | वो | ऽपि | च | र | णौ | त | पो | नि | धेः |
| क्ष | म्य | ता | मि | ति | व | द | न्स | म | स्पृ | शत् |
| नि | र्जि | ते | षु | त | र | सा | त | र | स्वि | नां |
| श | त्रु | षु | प्र | ण | ति | रे | व | की | र्त | ये |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.