अन्वयः
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निर्विष्टविषयस्नेहः दशान्तम् उपेयिवान् सः उषसि प्रदीपार्चिः इव आसन्ननिर्वाणः आसीत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
निर्विष्टेति॥ स्नेहयन्ति प्रीणयन्ति पुरुषमिति स्नेहाः। पचाद्यच्। स्निह्यन्ति पुरुषा येष्विति वा स्नेहाः। अधिकरणार्थे घञन्। विषयाः शब्दादयस्त एव स्नेहाः निर्विष्टा भुक्ता विषयस्नेहा येन स तथोक्तः।
निर्वेशो भृतिभोगयोःइति विश्वः। दशा जीवनावस्था तस्या अन्तं वार्घकमुपेयिवान्। स दशरथः। उषसि प्रदीपार्चिरिव दीपज्वालेव। आसन्नं निर्वाणं मोक्षो यस्य स तथोक्त आसीत्। अर्चिःपक्षे तु- विषयो देश आश्रयः। भाजनमिति यावत्। विषयः स्यादिन्द्रियार्थे देशे जनपदेऽपि च इति विश्वः। स्नेहस्तैलादिकरसे द्रवे स्यात्सौहृदेऽपि च इति विश्वः। दशा वर्तिका। दशा वर्ताववस्थायाम् इति विश्वः। निर्वाणैविनाशः। निर्वाणं निर्वृतौ मोक्षो विनाशे गजमज्जनेइति यादवः ॥
Summary
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King Dasharatha, having fully enjoyed worldly pleasures and reached the final stage of his life, was nearing his end (liberation). He resembled the flame of a lamp at dawn, which, having consumed its oil and reached the end of its wick, is on the verge of being extinguished.
सारांश
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सांसारिक सुखों का उपभोग कर चुके राजा दशरथ अपने जीवन के अंतिम चरण में पहुँच गए। वे मोक्ष के समीप वैसे ही लग रहे थे जैसे भोर के समय बुझने वाली दीपक की लौ।
पदच्छेदः
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| निर्विष्टविषयस्नेहः | निर्विष्ट–विषय–स्नेह (१.१) | he who had fully enjoyed the affections of worldly objects |
| सः | तत् (१.१) | he (Dasharatha) |
| दशान्तम् | दशा–अन्त (२.१) | the final stage of life |
| उपेयिवान् | उपेयिवस् (उप√इ+क्वसु, १.१) | had reached |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| आसन्ननिर्वाणः | आसन्न–निर्वाण (१.१) | whose extinction was near |
| प्रदीपार्चिः | प्रदीप–अर्चिस् (१.१) | the flame of a lamp |
| इव | इव | like |
| उषसि | उषस् (७.१) | at dawn |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | र्वि | ष्ट | वि | ष | य | स्ने | हः |
| स | द | शा | न्त | मु | पे | यि | वान् |
| आ | सी | दा | स | न्न | नि | र्वा | णः |
| प्र | दी | पा | र्चि | रि | वो | ष | सि |
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