रघुपतिरपि जातवेदोविशुद्धां प्रगृह्य प्रियां
प्रियसुहृदि विभीषणे संगमय्य श्रियं वैरिणः ।
रविसुतसहितेन तेनानुयातः ससौमित्रिणा
भुजविजितविमानरत्नाधिरूढः प्रतस्थे पुरीम् ॥
रघुपतिरपि जातवेदोविशुद्धां प्रगृह्य प्रियां
प्रियसुहृदि विभीषणे संगमय्य श्रियं वैरिणः ।
रविसुतसहितेन तेनानुयातः ससौमित्रिणा
भुजविजितविमानरत्नाधिरूढः प्रतस्थे पुरीम् ॥
प्रियसुहृदि विभीषणे संगमय्य श्रियं वैरिणः ।
रविसुतसहितेन तेनानुयातः ससौमित्रिणा
भुजविजितविमानरत्नाधिरूढः प्रतस्थे पुरीम् ॥
अन्वयः
AI
रघुपतिः अपि जातवेदोविशुद्धाम् प्रियाम् प्रगृह्य प्रियसुहृदि विभीषणे वैरिणः श्रियम् संगमय्य रविसुतसहितेन ससौमित्रिणा तेन अनुयातः भुजविजितविमानरत्नाधिरूढः पुरीम् प्रतस्थे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
रघुपतिरिति॥ रघुपतिरपि जातवेदस्यग्नौ विशुद्धां जातशुद्धिं प्रियां सीतां प्रगृह्य स्वीकृत्य। प्रियसुहृदि विभीषणे वैरिणो रावणस्य श्रियं राजलक्ष्मीं संगमय्य संगतां कृत्वा। गमेर्ण्यन्ताल्ल्यप्प्रत्ययः।
मितां ह्रस्वः (अष्टाध्यायी ६.४.९२ ) इति ह्रस्वः। ल्यपि लघुपूर्वात् (अष्टाध्यायी ६.४.५६ ) इति णेरयादेशः। रविसुतसहितेन सुग्रीवयुक्तेन ससौमित्रिणा सलक्ष्मणेन तेन विभीषणेनानुयातोऽनुगतः सन् विमानं रत्नमिव विमानरत्नमित्युपमितसमासः। भुजविजितं यद्विमानरत्नं पुष्पकं तदारूढः सन्। पुरीमयोध्यां प्रतस्थे। समवप्रविभ्यः स्थः (अष्टाध्यायी १.३.२२ ) इत्यात्मनेपदम्। अत्र प्रस्थानक्रियाया अकर्मकत्वेऽपि तदङ्गभूतोद्देशक्रियापेक्षया सकर्मकत्वम्। अस्ति च धातूनां क्रियान्तरोपसर्जनकस्वार्थाभिधायकत्वम्। यथा कुसूलान्पचति इत्यादावादानक्रियागर्भः पाको विधीयत इति ॥
Summary
AI
Rama, the Lord of the Raghus, accepted his beloved Sita after her purification by fire. He bestowed the kingdom of his fallen enemy upon his dear friend Vibhishana. Then, accompanied by Sugriva and Lakshmana, and followed by Vibhishana, Rama mounted the Pushpaka Vimana—the jewel of aerial chariots won by his own prowess—and set out for his capital city, Ayodhya.
सारांश
AI
श्री राम ने भी अग्नि से शुद्ध हुई सीता को स्वीकार कर और शत्रु की राजलक्ष्मी अपने मित्र विभीषण को सौंपकर, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण के साथ बाहुबल से जीते गए श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर अपनी नगरी की ओर प्रस्थान किया।
पदच्छेदः
AI
| रघुपतिः | रघुपति (१.१) | The lord of the Raghus |
| अपि | अपि | also |
| जातवेदः-विशुद्धाम् | जातवेदस्–विशुद्ध (२.१) | purified by the fire-god |
| प्रगृह्य | प्रगृह्य (प्र√ग्रह्+ल्यप्) | having accepted |
| प्रियाम् | प्रिया (२.१) | his beloved |
| प्रिय-सुहृदि | प्रिय–सुहृद् (७.१) | in his dear friend |
| विभीषणे | विभीषण (७.१) | in Vibhishana |
| संगमय्य | संगमय्य (सम्√गम्+णिच्+ल्यप्) | having bestowed |
| श्रियम् | श्री (२.१) | the royal fortune |
| वैरिणः | वैरिन् (६.१) | of the enemy |
| रवि-सुत-सहितेन | रवि–सुत–सहित (३.१) | by him who was accompanied by the son of the sun (Sugriva) |
| तेन | तद् (३.१) | by him (Vibhishana) |
| अनुयातः | अनुयात (अनु√या+क्त, १.१) | followed |
| स-सौमित्रिणा | स–सौमित्रि (३.१) | with Lakshmana |
| भुज-विजित-विमान-रत्न-अधिरूढः | भुज–विजित–विमान–रत्न–अधिरूढ (१.१) | mounted on the jewel of a celestial car won by the strength of his arms |
| प्रतस्थे | प्रतस्थे (प्र√स्था कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | set out |
| पुरीम् | पुरी (२.१) | to the city |
छन्दः
नाराचम् [१८: ननरररर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| र | घु | प | ति | र | पि | जा | त | वे | दो | वि | शु | द्धां | प्र | गृ | ह्य | प्रि | यां |
| प्रि | य | सु | हृ | दि | वि | भी | ष | णे | सं | ग | म | य्य | श्रि | यं | वै | रि | णः |
| र | वि | सु | त | स | हि | ते | न | ते | ना | नु | या | तः | स | सौ | मि | त्रि | णा |
| भु | ज | वि | जि | त | वि | मा | न | र | त्ना | धि | रू | ढः | प्र | त | स्थे | पु | रीम् |
| न | न | र | र | र | र | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.