अन्वयः
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रामः तु आसन्न-देशत्वात् पुनः भरत-आगमनम् आशङ्क्य उत्सुक-सारङ्गाम् चित्रकूट-स्थलीम् जहौ ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
राम इति॥ रामस्त्वासन्नदेशत्वाद्धेतोः पुनर्भरतागमनमाशङ्क्योत्सुकसारङ्गामुत्कण्ठितहरिणां चित्रकूटस्थलीं जहौ तत्याज। आसन्नश्चासौ देशश्चेति विग्रहः ॥
Summary
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But Rama, fearing the arrival of Bharata again due to the proximity of the location, left the grounds of Chitrakuta, where the deer had become anxious.
सारांश
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भरत के पुनः आगमन की आशंका से श्री राम ने चित्रकूट की उस भूमि को छोड़ दिया, जहाँ के हिरण उनके प्रति उत्सुक थे।
पदच्छेदः
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| रामः | राम (१.१) | Rama |
| तु | तु | but |
| आसन्नदेशत्वात् | आसन्न–देश–त्व (५.१) | due to the proximity of the place |
| भरतागमनम् | भरत–आगमन (२.१) | Bharata's arrival |
| पुनः | पुनर् | again |
| आशङ्क्य | आशङ्क्य (आ√शङ्क्+ल्यप्) | fearing |
| उत्सुकसारङ्गाम् | उत्सुक–सारङ्ग (२.१) | where the deer were attached |
| चित्रकूटस्थलीम् | चित्रकूट–स्थली (२.१) | the region of Chitrakuta |
| जहौ | जहौ (√हा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | left |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | म | स्त्वा | स | न्न | दे | श | त्वा |
| द्भ | र | ता | ग | म | नं | पु | नः |
| आ | श | ङ्क्यो | त्सु | क | सा | र | ङ्गां |
| चि | त्र | कू | ट | स्थ | लीं | ज | हौ |
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