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संरम्भं मैथिलीहासः क्षणसौम्यां निनाय ताम् ।
निवातस्मिमितां वेलां चद्रोदय इवोदधेः ॥

अन्वयः AI मैथिलीहासः ताम् क्षणसौम्यां संरम्भं निनाय चन्द्रोदयः उदधेः निवातस्मिमितां वेलाम् इव ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) संरम्भमिति॥ मैथिलीहासः क्षणं सौम्यां सौम्याकारां तां राक्षसीम्। निवातेन स्तिमितां निश्चलामुदधेर्वेलामम्बुविकृतिम्। अम्बुपूरमित्र्थः। अब्ध्यम्बुविकृतौ वेला इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२०७ ) । चन्द्रोदय इव। संरम्भं संक्षोभं निनाय ॥
Summary AI Sita's laughter provoked the momentarily calm Surpanakha into a fury, just as the rising moon causes the windless, still tide of the ocean to surge violently.
सारांश AI माता सीता की हँसी ने शांत दिख रही शूर्पणखा को अत्यंत क्रोधित कर दिया, जैसे चंद्रोदय शांत समुद्र की लहरों में उथल-पुथल मचा देता है।
पदच्छेदः AI
संरम्भम्संरम्भ (२.१) fury
मैथिलीहासःमैथिलीहास (१.१) Sita's laugh
क्षणसौम्याम्क्षणसौम्या (२.१) momentarily gentle
निनायनिनाय (√नी कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) made
ताम्तद् (२.१) her
निवातस्तिमिताम्निवातस्तिमित (२.१) still in the absence of wind
वेलाम्वेला (२.१) the tide
चन्द्रोदयःचन्द्रउदय (१.१) the rising of the moon
इवइव like
उदधेःउदधि (६.१) of the ocean
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
सं म्भं मै थि ली हा सः
क्ष सौ म्यां नि ना ताम्
नि वा स्मि मि तां वे लां
द्रो वो धेः
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