सा किलाश्वासिता चण्डी भर्त्रा तत्संश्रुतौ वरौ ।
उद्ववामेन्द्रसिक्ता भूर्बिलमग्नाविवोरगौ ॥

अन्वयः AI भर्त्रा आश्वासिता सा चण्डी तत्संश्रुतौ द्वौ वरौ इन्द्रसिक्ता भूः बिलमग्नौ उरगौ इव उद्ववाम ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) सेति॥ चण्ड्यतिकोपना। चण्डस्त्वत्यन्तकोपनः इत्यमरः (अमरकोशः ३.१.३२ ) । सा किल भर्त्राऽऽश्वासिताऽनुनीता सती तेन भर्त्रा संश्रुतौ प्रतिज्ञातौ वरौ। इन्द्रेणसिक्ताऽभिवृष्टा भूर्बिले वल्मीकादौ मग्नावुरगाविव। उद्ववामोज्जगार ॥
Summary AI Once consoled by her husband, the angry Kaikeyi brought forth the two boons previously promised to her. This act was like the earth, when drenched by rain, forcing out two serpents that had been hidden deep within a hole.
सारांश AI पति द्वारा सांत्वना दी गई क्रोधी कैकेयी ने अपने वे दो वरदान वैसे ही प्रकट किए, जैसे वर्षा के जल से भीगे बिल से दो साँप बाहर निकल आते हैं।
पदच्छेदः AI
सातद् (१.१) She
किलकिल indeed
आश्वासिताआश्वासित (आ√श्वस्+णिच्+क्त, १.१) reassured
चण्डीचण्डी (१.१) the fierce one
भर्त्राभर्तृ (३.१) by her husband
तत्संश्रुतौतत्संश्रुत (२.२) those two promised
वरौवर (२.२) two boons
उद्ववामउद्ववाम (उद्√वम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) brought forth
इन्द्रसिक्ताइन्द्रसिक्त (१.१) sprinkled by Indra
भूःभू (१.१) the earth
बिलमग्नौबिलमग्न (२.२) hidden in a hole
इवइव like
उरगौउरग (२.२) two snakes
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
सा कि ला श्वा सि ता ण्डी
र्त्रा त्सं श्रु तौ रौ
द्व वा मे न्द्र सि क्ता भू
र्बि ग्ना वि वो गौ
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