अन्वयः
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सः रावणहृतां मैथिलीं ताभ्यां वचसा आचष्ट, आत्मनः सुमहत् कर्म व्रणैः आवेद्य संस्थितः ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स इति॥ स जटायू रावणहृतां मैथिलीं ताभ्यां रामलक्ष्मणाभ्याम्।
क्रियाग्रहणमपि कर्तव्यम्इति संप्रदानत्वाञ्चतुर्थी। वचसा वाग्वृत्त्याचष्ट। आत्मनः सुमहत्कर्म युद्धरूपं व्रणैरावेद्य संस्थितो मृतः ॥
Summary
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Jatayu informed the brothers that Sita had been carried off by Ravana; having testified to his own great service through his fatal wounds, he then passed away.
सारांश
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जटायु ने रावण द्वारा सीता के हरण का समाचार दिया और अपने घावों से अपने पराक्रम का परिचय देते हुए प्राण त्याग दिए।
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | he (Jatayu) |
| रावणहृताम् | रावण–हृता (२.१) | abducted by Ravana |
| ताभ्याम् | तद् (४.२) | to the two of them |
| वचसा | वचस् (३.१) | with words |
| आचष्ट | आचष्ट (आ√चक्ष् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | informed |
| मैथिलीम् | मैथिली (२.१) | the princess of Mithila (Sita) |
| आत्मनः | आत्मन् (६.१) | his own |
| सुमहत् | सु–महत् (२.१) | very great |
| कर्म | कर्मन् (२.१) | deed |
| व्रणैः | व्रण (३.३) | through his wounds |
| आवेद्य | आवेद्य (आ√विद्+णिच्+ल्यप्) | having revealed |
| संस्थितः | संस्थित (सम्√स्था+क्त, १.१) | while dying |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | रा | व | ण | हृ | तां | ता | भ | ||
| अ | यां | व | च | सा | च | ष्ट | मै | थि | लीम् |
| आ | त्म | नः | सु | म | ह | त्क | र्म | ||
| व्र | णै | रा | वे | द्य | सं | स्थि | तः |
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