अन्वयः
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रामः पित्रा दत्तां महीं प्राक् रुदन् प्रत्यपद्यत पश्चात् वनाय गच्छ इति तदाज्ञां मुदितः अग्रहीत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
पित्रेति॥ रामः। प्राक् पित्रा दत्तां महीं रुदन्प्रत्यपद्यताङ्गीचकार। स्वत्यागदुःखादिति भावः। पश्चाद्वनाय गच्छेत्येवंरूपां तदाज्ञां पित्राज्ञां मुदितोऽग्रहीत्। पित्राज्ञाकरणलाभादिति भावः ॥
Summary
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When his father previously offered him the kingdom, Rama accepted it with tears (out of humility or empathy for the responsibility). However, when ordered to go to the forest, he accepted that command with a joyful heart, showing his supreme devotion to his father's word.
सारांश
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राम ने पहले पिता द्वारा दुःख में दी गई पृथ्वी को स्वीकार किया, किंतु बाद में वन जाने की पिता की आज्ञा को उन्होंने अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण किया।
पदच्छेदः
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| पित्रा | पितृ (३.१) | by his father |
| दत्तां | दत्त (√दा+क्त, २.१) | given |
| रुदन् | रुदत् (√रुद्+शतृ, १.१) | weeping |
| रामः | राम (१.१) | Rama |
| प्राक् | प्राच् | at first |
| महीं | मही (२.१) | the kingdom |
| प्रत्यपद्यत | प्रत्यपद्यत (प्रति√पद् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | accepted |
| पश्चात् | पश्चात् | afterwards |
| वनाय | वन (४.१) | to the forest |
| गच्छ | गच्छ (√गम् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | go |
| इति | इति | thus |
| तदाज्ञां | तत्–आज्ञा (२.१) | his command |
| मुदितः | मुदित (√मुद्+क्त, १.१) | joyful |
| अग्रहीत् | अग्रहीत् (√ग्रह् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | accepted |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पि | त्रा | द | त्तां | रु | द | न्रा | मः |
| प्रा | ङ्म | हीं | प्र | त्य | प | द्य | त |
| प | श्चा | द्व | ना | य | ग | च्छे | ति |
| त | दा | ज्ञां | मु | दि | तो | ऽग्र | हीत् |
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