अन्वयः
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अथ रक्षः शत्रवे अयःशङ्कुचितां वैवस्वतस्य कूटशाल्मलिम् इव हृतां शतघ्नीम् अक्षिपत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अय इति॥ अथ रक्षो रावणोऽयसः शङ्कुभिः कीलैश्चितां कीर्णा शतघ्नीं सोहकण्टककीलितयष्टिविशेषम्।
शतघ्नी तु चतुस्ताला लोहकण्टकसंचिता। यष्टिः इति केशवः। हृतां विजयलब्धाम्। वैवस्वतस्यान्तकस्य कूटशाल्मलिमिव। शत्रवे राघवायाक्षिपत् क्षिप्तवान्। कूटशाल्मलिरिव कूटशाल्मलिरिति व्युत्पत्त्या वैवस्वतगदाया गौणी संज्ञा। कूटशाल्मलिर्नामैकमूलप्रकृतिः कण्टकी वृक्षविशेषः। रोचनः कूटशाल्मलिः इत्यमरः (अमरकोशः २.४.४७ ) । तत्सादृश्यं च गदाया अयःसंङ्कुचितत्वादनुसंधेयम् ॥
Summary
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Then the demon Ravana hurled at his enemy a Shataghni weapon studded with iron spikes, which looked like the terrifying, thorny Kuta-shalmali tree brought from the domain of Yama, the god of death.
सारांश
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राक्षस रावण ने शत्रु राम पर लोहे की कीलों से जड़ी 'शतघ्नी' नामक गदा फेंकी, जो यमराज के कूटशाल्मली वृक्ष के समान भयानक थी।
पदच्छेदः
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| अयःशङ्कुचितां | अयस्–शङ्कु–चित (२.१) | studded with iron spikes |
| रक्षः | रक्षस् (१.१) | the Rakshasa (Ravana) |
| शतघ्नीम् | शतघ्नी (२.१) | a Shataghni |
| अथ | अथ | then |
| शत्रवे | शत्रु (४.१) | at the enemy |
| हृतां | हृत (√हृ+क्त, २.१) | snatched |
| वैवस्वतस्य | वैवस्वत (६.१) | of Vaivasvata (Yama) |
| इव | इव | like |
| कृटाशाल्मलिम् | कूट–शाल्मलि (२.१) | the Kuta-shalmali tree |
| अक्षिपत् | अक्षिपत् (आ√क्षिप् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | threw |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | यः | श | ङ्कु | चि | तां | र | क्षः |
| श | त | घ्नी | म | थ | श | त्र | वे |
| हृ | तां | वै | व | स्व | त | स्ये | व |
| कृ | टा | शा | ल्म | लि | म | क्षि | पत् |
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