प्रवृत्तमात्रेण पयांसि पातु-
मावर्तवेगाद्भ्रमता घनेन ।
आभाति भूयिष्ठमयं समुद्रः
प्रमध्यमानो गिरिणेव भूयः ॥

अन्वयः AI पयांसि पातुम् प्रवृत्त-मात्रेण आवर्त-वेगात् भ्रमता घनेन अयम् समुद्रः, भूयः गिरिणा प्रमध्यमानः इव, भूयिष्ठम् आभाति ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) प्रवृत्तेति॥ पयांसि पातुं प्रवृत्त एव प्रवृत्तमात्रो न तु पीतवान्, तेन आवर्तवेगात्। स्यादावर्तोऽम्भसां भ्रमः इत्यमरः (अमरकोशः १.१०.६ ) । भ्रमता घनेनायं समुद्रो भूयः पुनरपि गिरिणा मन्दरेण प्रमथ्यमान इव भूयिष्ठमत्यन्तमाभाति ॥
Summary AI "As a cloud, just beginning to drink water, whirls with the force of a vortex, this ocean appears exceedingly brilliant, as if it is being churned once again by Mount Mandara."
सारांश AI जल पीने के लिए भँवर की गति से घूमते हुए काले बादलों के कारण ऐसा लग रहा है मानो मंदराचल पर्वत से समुद्र का पुनः मंथन किया जा रहा हो।
पदच्छेदः AI
प्रवृत्त-मात्रेणप्रवृत्तमात्र (३.१) by the one that has just begun
पयांसिपयस् (२.३) water
पातुम्पातुम् (√पा+तुमुन्) to drink
आवर्त-वेगात्आवर्तवेग (५.१) with the force of a whirlpool
भ्रमताभ्रमता (√भ्रम्+शतृ, ३.१) by the whirling
घनेनघन (३.१) by the cloud
आभातिआभाति (आ√भा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) appears
भूयिष्ठम्भूयिष्ठम् exceedingly
अयम्इदम् (१.१) this
समुद्रःसमुद्र (१.१) ocean
प्रमध्यमानःप्रमध्यमान (प्र√मन्थ्+शानच्, १.१) being churned
गिरिणागिरि (३.१) by the mountain (Mandara)
इवइव as if
भूयःभूयस् again
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
प्र वृ त्त मा त्रे यां सि पा तु
मा र्त वे गा द्भ्र ता ने
भा ति भू यि ष्ठ यं मु द्रः
प्र ध्य मा नो गि रि णे भू यः
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