अन्वयः
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आयत-अक्षि! वेला-अनिलः केतक-रेणुभिः ते आननम् संभावयति । (सः) मण्डन-काल-हानेः अक्षमम् बिम्ब-अधर-बद्ध-तृष्णम् माम् वेत्ति इव ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
वेलेति॥ हे आयताक्षि!
वेला स्यात्तीरनीरयोः इति विश्वः। वेलानिलः केतकरेणुभिस्त आननं संभावयति। किमर्थमित्यपेक्षायामुत्प्रेक्ष्यते-बिम्बाधरे बद्दतृष्णं मां मण्डनेनाभरणक्रियया कालहानिर्विलम्बस्तस्या अक्षममसहमानम्। कर्मणि षष्ठी। कालहानिमसहमानं वेत्तीव वेत्ति किम्? नो चेत्कथं संभावयेदित्यर्थः ॥
Summary
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"O long-eyed one! The sea-breeze adorns your face with Ketaki pollen, as if it knows that I, who long for your Bimba-fruit-like lips, am impatient at this delay in your beautification."
सारांश
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हे आयताक्षी! तट की वायु केतकी के पराग से तुम्हारे मुख को अलंकृत कर रही है, मानो वह तुम्हारे बिम्बाधरों के चुंबन के लिए मेरी आतुरता को जानती हो।
पदच्छेदः
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| वेला-अनिलः | वेला–अनिल (१.१) | The shore-breeze |
| केतक-रेणुभिः | केतक–रेणु (३.३) | with the pollen of Ketaki flowers |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| संभावयति | संभावयति (सम्√भू +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | adorns |
| आननम् | आनन (२.१) | face |
| आयत-अक्षि | आयत–अक्षि (८.१) | O long-eyed one |
| माम् | अस्मद् (२.१) | me |
| अक्षमम् | अक्षम (२.१) | impatient |
| मण्डन-काल-हानेः | मण्डन–काल–हानि (६.१) | of the loss of time for adornment |
| वेत्ति | वेत्ति (√विद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | knows |
| इव | इव | as if |
| बिम्ब-अधर-बद्ध-तृष्णम् | बिम्ब–अधर–बद्ध–तृष्ण (२.१) | who has a longing for your Bimba-like lips |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वे | ला | नि | लः | के | त | क | रे | णु | भि | स्ते |
| सं | भा | व | य | त्या | न | न | मा | य | ता | क्षि |
| मा | म | क्ष | मं | म | ण्ड | न | का | ल | हा | ने |
| र्वे | त्ती | व | बि | म्बा | ध | र | ब | द्ध | तृ | ष्णम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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