असौ महेन्द्रद्विपदानगन्धि-
स्त्रिमार्गगावीचिविमर्दशीतः ।
आकाशवायुर्दिनयौवनोत्था-
नाचामति स्वेदलवान्मुखे ते ॥
असौ महेन्द्रद्विपदानगन्धि-
स्त्रिमार्गगावीचिविमर्दशीतः ।
आकाशवायुर्दिनयौवनोत्था-
नाचामति स्वेदलवान्मुखे ते ॥
स्त्रिमार्गगावीचिविमर्दशीतः ।
आकाशवायुर्दिनयौवनोत्था-
नाचामति स्वेदलवान्मुखे ते ॥
अन्वयः
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असौ महेन्द्रद्विपदानगन्धिः त्रिमार्गगावीचिविमर्दशीतः आकाशवायुः ते मुखे दिनयौवनोत्थान् स्वेदलवान् आचामति ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
असाविति॥ महेन्द्रद्विपदानगन्धिरैरावतमदगन्धिः। त्रिभिमार्गैर्गच्छतीति त्रिमार्गगा गङ्गा।
तद्धितार्थ- (अष्टाध्यायी २.१.५१ ) इत्यादिनोत्तरपदसमासः। तस्या वीचीनां विमर्देन संपर्केण शीतोऽसावाकाशवायुर्दिनयौवनोत्थान्मध्याह्नसंभवांस्ते मुखे स्वेदलवानाचामति हरति। अनेन सुरपथसंचारो दर्शितः ॥
Summary
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Rama tells Sita that this celestial wind, fragrant like the ichor of Indra's elephant Airavata and cooled by the waves of the Ganga, is sipping away the drops of perspiration from her face, caused by the midday heat.
सारांश
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गंगा की लहरों के स्पर्श से शीतल और ऐरावत के मद की गंध वाला यह आकाश का पवन दोपहर की गर्मी से हुए तुम्हारे मुख के पसीने को सुखा रहा है।
पदच्छेदः
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| असौ | अदस् (१.१) | This |
| महेन्द्रद्विपदानगन्धिः | महेन्द्र–द्विप–दान–गन्धिन् (१.१) | fragrant with the ichor of Indra's elephant |
| त्रिमार्गगावीचिविमर्दशीतः | त्रिमार्गगा–वीचि–विमर्द–शीतल (१.१) | cooled by contact with the waves of the Ganga |
| आकाशवायुः | आकाश–वायु (१.१) | wind of the sky |
| दिनयौवनोत्थान् | दिन–यौवन–उत्थ (२.३) | arisen from the midday heat |
| आचामति | आचामति (आ√चम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | sips away |
| स्वेदलवान् | स्वेद–लव (२.३) | the drops of perspiration |
| मुखे | मुख (७.१) | on the face |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | सौ | म | हे | न्द्र | द्वि | प | दा | न | ग | न्धि |
| स्त्रि | मा | र्ग | गा | वी | चि | वि | म | र्द | शी | तः |
| आ | का | श | वा | यु | र्दि | न | यौ | व | नो | त्था |
| ना | चा | म | ति | स्वे | द | ल | वा | न्मु | खे | ते |
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